कश्मीरी पंडितों की वापसी के हक़ में हुर्रियत

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हुर्रियत के उदारवादी धड़े के प्रमुख मीरवाइज उमर फ़ारूक़ का कहना है कि कश्मीर मसला और कश्मीरी पंडितों की घर वापसी का एक दूसरे से कोई ताल्लुक़ नहीं है.

उनका कहना है कि कश्मीर मसले के हल में चाहे जितना समय लगे कश्मीरी पंडितों की वापसी के लिए कोशिशें शुरू हो जानी चाहिए.

वो मानते हैं कि ऐसे क़दम उठाए जाने चाहिए कि पंडितों को लगे कि कश्मीर के बहुसंख्यक मुस्लिम ये चाहते हैं कि कश्मीरी पंडित अपने घरों को लौटें.

मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ ने बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन से कश्मीरी पंडितों की वापसी पर हुई बातचीत के दौरान ये बातें कहीं.

बातचीत के अंश

कश्मीर समस्या और पंडितों की वापसी का कोई संबंध नहीं. कश्मीर समस्या का हल जब होगा तब होगा लेकिन पंडितों की वापसी के लिए क़दम उठाए जाने चाहिए.

हालांकि ये भी एक सच है कि लोगों के दिलों में ख़ौफ़ है. उसे दूर करने का सबसे बेहतरीन तरीक़ा है कि 'पीपुल-टू-पीपुल कॉन्टैक्ट' बहाल किया जाए.

ये इस समस्या को हल करने का सबसे अच्छी पहल होगी.

इसकी झलकियां हमें हाल के दिनों में देखने को मिलीं. पिछले एक हफ़्ते में दो बड़े आयोजन यहां हुए एक तुलमुल की जिसमें हज़ारों कश्मीरी पंडितों ने शिरकत की.

गांदरबल में भी बहुत सारे कश्मीरियों ने हिस्सा लिया.

जो अपनापन और भाईचारा है उसकी झलक हमें फिर से देखने को मिल रही हैं. मैंने इस सिलसिले में जामिया मस्जिद से ऐलान भी किया है.

मैंने, सैयद अली शाह गिलानी और जेकेएलएफ के यासिन मल्लिक ने मिलकर ये तय किया कि कश्मीरी पंडितों की वापसी को लेकर एक समीति का गठन किया जाए.

यह कमेटी पहले घाटी में मौजूद पंडितों से बात करेगी, उसके बाद जम्मू और कैंप में रह रहे पंडितों से बातचीत करेगी और फिर देश में अलग-अलग जगहों पर बस चुके कश्मीरी पंडितों से संपर्क करेगी.

भारतीय जनता पार्टी और पीडीपी जिस तरह कश्मीरी पंडितों को अलग टाउनशिप में बसाने की बात कर रहे हैं वो पूरे मामले का राजनीतिकरण है, जिससे बचा जाना चाहिए.

एक तरफ़ तो भारत का क़ानून सभी समुदायों को साथ रखने की बात करता है दूसरी तरफ़ ये सरकार उन्हें अलग बसाने पर अमादा है. जबकि हुर्रियत ये चाहती है कि हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई साथ रहें. अलग शहर में रखे जाने से तो दूरियां और बढ़ेगी. .

हमें ख़ुशी है कि पिछले कुछ दिनों से घाटी में इस बात पर चर्चा हो रही है कि कश्मीरी पंडितों को किस तरह वापस लाया जाना चाहिए. पंडित जब पहले एक बार यहां आए थे तो उन्होंने हमसे भी मुलाक़ात की थी और हमारी एक बैठक में मैंने ये सुझाव दिया था कि इसे साझा तौर पर शुरु किया जाए जिसे सब लोगों ने माना था.

कश्मीरी मुसलमानों पर हमेशा से उंगली उठती रही है कि वे पंडितों को संरक्षण नहीं दे सके जिसकी वजह से उन्हें वादी छोड़ना पड़ा.

यह बात यहां के मुसलमानों को आज भी परेशान करती है. क्योंकि उन्हें लगता है कि कश्मीरी पंडित इस घाटी का ही हिस्सा हैं.

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