'अब भारत को पाक के चश्मे से नहीं देखता सऊदी अरब'

रियाद में मोदी
इमेज कैप्शन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को दो दिन के सऊदी अरब दौरे पर पहुंचे
    • Author, सिराज वहाब
    • पदनाम, रियाद से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
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पहले जब भारत और सऊदी अरब के रिश्तों की बात होती थी तो कहा जाता था कि भारत को पाकिस्तान के प्रिज्म से देखा जाता है लेकिन 2001 में अमरीका पर हुए चरमपंथी हमले के बाद स्थितियां पूरी तरह बदल गई हैं.

शीतयुद्ध की समाप्ति और अमरीका में 2001 में हुए चरमपंथी हमले के बाद से सभी देशों ने अपनी विदेश नीति की समीक्षा की है और अपने व्यावसायिक हितों को प्राथमिकता दी है.

सऊदी अरब तेल का बहुत बड़ा उत्पादक है लेकिन उसे ख़रीदार भी चाहिए. इन ख़रीदारों में भारत की भूमिका अहम है. चीन और भारत की अर्थव्यवस्थाएं तेज़ी से उभर रही हैं और सऊदी अरब उनकी तेल ज़रूरतों को पूरा करना चाहता है.

सऊदी अरब तेल बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी बरक़रार रखना चाहता है. ऐसे में सऊदी अरब भारत को पाकिस्तान और सियासी नज़रिए से नहीं बल्कि आर्थिक नज़रिए से देखता है.

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आर्थिक दृष्टि से भारत का पलड़ा बहुत भारी है क्योंकि उसकी तेल ज़रूरत का 20 प्रतिशत हिस्सा सऊदी अरब से आता है. इस तरह तेल के मामले में दोनों देशों के संबंध बहुत अहम हैं.

सऊदी अरब में करीब 30 लाख भारतीय रहते हैं. इन लोगों ने सऊदी अरब के विकास में अहम भूमिका निभाई है. इन्हीं लोगों की मेहनत के कारण सऊदी अरब में भारत के लिए बहुत सम्मान है.

दोनों देशों के ऐतिहासिक रिश्ते रहे हैं लेकिन साल 2000 के बाद इसमें गर्माहट आई. साल 2001 में तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह यहां आए थे और उन्होंने इन रिश्तों को नई ऊंचाई दी.

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उसके बाद से दोनों देशों के रिश्ते लगातार बेहतर हो रहे हैं. सऊदी अरब के शाह अब्दुल्ला 2006 में गणतंत्र दिवस में मुख्य अतिथि बने थे और दोनों देशों के संबंध अब रणनीतिक स्तर पर आ गए हैं.

भारत और सऊदी अरब के रिश्ते अब केवल आर्थिक नहीं रह गए हैं. उनमें राजनीतिक और रक्षा सहयोग के अलावा आपसी हित के मुद्दे भी शामिल हैं. दोनों देशों के रिश्तों में अब पाकिस्तान की कोई अहमियत नहीं है.

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रविवार को मोदी की मुलाक़ात शाह सलमान से होगी और साथ ही वह दो शहजादों से भी मिलेंगे. इस दौरान कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद है. इससे दोनों देशों के बीच राजनीतिक, रक्षा और आर्थिक रिश्ते मजबूत होंगे.

इससे पहले मोदी शनिवार को भारतीय कंपनी लार्सन एंड टुब्रो के कैंप में गए. उन्होंने वहां भारतीय कामगारों की समस्याएं सुनी और उनके साथ खाना भी खाया.

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यहां काम करने वाले भारतीय हर साल अरबों डॉलर भारत भेजते हैं जिसकी वहां की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका है.

अरब देशों में काम कर रहे भारतीयों को लगता है कि उन्हें भारतीय मीडिया या सरकार में उतनी तवज्जो नहीं दी जाती है जितनी कि पश्चिमी देशों में रहने वाले भारतीयों को मिलती है.

पश्चिमी देशों में रहने वाले भारतीयों को तो वहां की नागरिकता मिल जाती है लेकिन सऊदी अरब या दुबई आने वाले भारतीयों को यहां नागरिकता नहीं मिलती है.

इन लोगों का कहना है कि खाड़ी देशों में रहने वाले लोग अपनी सारी कमाई भारत भेजते हैं जबकि अमरीका में रहने वाले भारतीय अपनी कमाई वहीं ख़र्च करते हैं.

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खाड़ी देशों में भारतीयों के बच्चे केवल 12वीं तक पढ़ सकते हैं लेकिन इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए यहां कोई अंतरराष्ट्रीय संस्थान नहीं है. स्थानीय संस्थाओं में उन्हें दाखिला नहीं मिलता है.

इन लोगों की मांग है कि खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों के बच्चों की पढ़ाई के लिए भारत में कोई योजना होनी चाहिए.

(बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद से बातचीत पर आधारित)

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