यमुना पर 'आर्ट ऑफ लिविंग' कार्यक्रम का विवाद क्या है?

एनजीटी यमुना बैंक
    • Author, आरजू सिद्दीकी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
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यमुना नदी के तट पर श्री श्री रविशंकर की संस्था ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ 11 से 13 मार्च तक ‘वर्ल्ड कल्चर फ़ेस्टिवल’ का आयोजन कराना चाहती है.

इस बारे में ज़ोरशोर से तैयारियां भी चल रही हैं लेकिन इस आयोजन को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में चुनौती दी गई थी.

एनजीटी ने दिल्ली सरकार, दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) और आर्ट ऑफ लिविंग के गुरु श्री श्री रविशंकर को इस बारे में 11 फ़रवरी को नोटिस जारी किया था.

जानिए कि ये 'वर्ल्ड कल्चर फ़ेस्टिवल' क्यों विवादों में घिर गया है और क्या है पूरा मामला:

एनजीटी चेयरपर्सन जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली बेंच ने दिल्ली सरकार, डीडीए और श्री श्री रविशंकर को नोटिस ‘यमुना जियो अभियान’ के संचालक और पर्यावरणविद् मनोज मिश्रा की अपील पर सुनवाई करते हुए जारी किया था.

एनजीटी यमुना बैंक

मनोज मिश्रा ने बीबीसी को बताया, “ यमुना ‘फ्लड्स प्लेन’ कई तरह की संवेदनशील जैविक गतिविधियों का स्थल है. लेकिन इस कार्यक्रम के लिए वहाँ की हरियाली को जलाकर उस पर मलबा डाल कर पूरे क्षेत्र को समतल कर दिया गया है, जिससे यमुना के माहौल को हमेशा के लिए नुकसान हुआ है.”

आरोप है कि डीडीए ने एनजीटी के आदेशों के ख़िलाफ़ जाकर ‘एक्टिव यमुना फ्लडस प्लेन’ पर इस तरह के भव्य आयोजन की अनुमति दी.

हालांकि डीडीए ने पहले दो बार इस आयोजन के आग्रह को ठुकरा दिया था लेकिन तीसरी बार उसने अनुमति दे दी.

यमुना, एनजीटी

कार्यक्रम के लिए किया जा रहा निर्माण उस इलाक़े में है जो नदी के पिछले 10 साल के बाढ़ क्षेत्र के भीतर है जबकि एनजीटी ने बीते 25 वर्ष के बाढ़ क्षेत्र के अंदर किसी भी तरह के आयोजन एवं निर्माण को प्रतिबंधित कर रखा है.

डीडीए के प्रिंसिपल कमिश्नर जेपी अग्रवाल कुछ अलग ही राय रखते हैं. वह कहते हैं कि अक्षरधाम और डीटीसी का मिलेनियम बस डिपो भी यमुना खादर पर ही बना है तो उससे क्या नुकसान हुआ?

वे कहते है, “ यमुना खादर में कितनी ही अनधिकृत कॉलोनियाँ बसी हैं, लोग रह रहे हैं, खेती हो रही है. इससे अगर यमुना के पर्यावरण को नुकसान नहीं होता तो इस कार्यक्रम से क्या नुकसान होगा.”

कार्यक्रम की वेबसाइट के मुताबिक इसमें 155 देशों के लगभग 35 लाख लोगों के शामिल होने की संभावना है. लेकिन कोर्ट में संस्था ने सिर्फ 2 से 3 लाख लोगों के शामिल होने की बात कही है जबकि कार्यक्रम स्थल पर निर्माण की व्यापकता इस बात को झुठलाती है.

यमुना, एनजीटी

कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी जाने की बात कही गई है, हालाँकि राष्ट्रपति के दफ़्तर ने स्पष्ट किया है कि वो इसमें शामिल नहीं होंगे.

‘आर्ट ऑफ लिविंग’ के निदेशक गौतम विग कार्यक्रम आयोजन के बारे में आश्वस्त दिखते हैं. उनका कहना है कि उन्होंने डीडीए के आदेशानुसार ही पूरी तरह अस्थायी निर्माण किया और कोई कचरे की डंपिंग नहीं की है.

उन्होनें कहा, “हमारे ऊपर यहाँ मलबा डालने का आरोप लग रहा है लेकिन हमने 500 ट्रक कचरा और मलबा यहाँ से हटाया है. इस बारे में मैने डीडीए को 14 दिसंबर को ही लेटर लिख सूचित कर दिया था.”

यमुना, एनजीटी

तस्वीरों में उनका यह दावा कमजोर नज़र आता है. कचरे की डंपिंग के निशान निर्माण स्थल पर बिखरे पड़े थे, जिनका इस्तेमाल यमुना तल के गड्ढों को भरने के लिए किया गया. इस पर बाद में रोड रोलर चला कर ज़मीन को समतल कर दिया गया.

कई जगहों पर यमुना की मुख्यधारा का रुख़ मोड़ने और उससे छेड़छाड़ के भी साफ निशान मिलते हैं.

एनजीटी ने आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर एके गुसाईं के नेतृत्व में, डीडीए के प्रतिनिधियों समेत एक टीम को 16 फरवरी को प्रस्तावित स्थल पर हो रहे निर्माण कार्य की स्थिति की जाँच कर रिपोर्ट देने का को गया था.

दोनों रिपोर्ट 19 फरवरी को एनजीटी को दे दी गईं.

यमुना, एनजीटी

बाद में एनजीटी ने शशि शेखर की अध्यक्षता में प्रिंसिपल कमेटी और पर्यावरण व वन मंत्रालय को भी प्रस्तावित आयोजन स्थल की जाँच के लिए भेजा. इनकी रिपोर्ट 23 और 26 फरवरी को एनजीटी के सामने पेश की गई.

सभी रिपोर्टों में यह बात सामने आई है कि कार्यक्रम के आयोजन के लिए हो रहे निर्माण कार्य में नियमों को ताक पर रखा गया जिससे यमुना नदी और उसके प्राकृतिक माहौल को नुकसान पहुँचा है.

शशि शेखर की प्रिंसिपल कमेटी ने आयोजनकर्ताओं से 100-120 करोड़ रुपये का जुर्माना वसूलने की सिफारिश की है ताकि वहां डाले गए मलबा और कचरे को हटा कर यमुना तल के पर्यावरण को फिर से ज़िंदा किया जा सके.

वहीं प्रोफ़ेसर गुसाईं अपनी रिपोर्ट में कहते हैं निर्माण का कैनवस इतना बड़ा और व्यापक है कि एक साथ कैमरे में कैपचर करना लगभग असंभव है. इसे सिर्फ वहाँ जा कर ही देखा जा सकता है. रिपोर्ट में वह लिखते हैं कि इस कार्यक्रम के आयोजन की अनुमति देना एक बुरी मिसाल होगी.

नाम न छापने की शर्त पर डीडीए के एक अधिकारी बताते हैं कि पहले इस तरह के मामलों में एनजीटी तुरंत निर्माण कार्य को फैसला आने तक रुकवा देता था, लेकिन अब तो 90 प्रतिशत काम हो चुका है और यमुना को जो नुकसान होना था वो हो चुका है...

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