आंदोलन हार गया, पार्टी सत्ता में

    • Author, राम कृपाल सिंह
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

आम आदमी पार्टी के गठन के तीन साल पूरे हो चुके हैं. समाजसेवी अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में शुरू हुए आंदोलन ने पहले राजनीतिक पार्टी का चोला पहना और फिर इतिहास रचते हुए दिल्ली में सत्ता तक पहुँची.

जिस नारे से पार्टी का जन्म हुआ था, बेशक पार्टी के रूप में उनकी कई उपलब्धियां हैं. लेकिन जिन उद्देश्यों और सिद्धांतों को लेकर पार्टी चली थी, वह कमज़ोर हुआ है.

आम आदमी पार्टी के अब तक सफ़र को जानने-समझने के लिए कुछ साल पहले के इतिहास में जाना चाहूँगा. 1971 में इंदिरा गांधी को ‘ग़रीबी हटाओ’, ‘बैंकों का राष्ट्रीयकरण’ जैसे कामों से अपार सफलता मिली.

अन्ना हज़ारे

1974 के आते-आते जेपी के नेतृत्व में एक बड़ा आंदोलन शुरू हुआ. पहली बार ऐसा हुआ जब दक्षिणपंथ और वामपंथ को जेपी एक ही मंच पर लेकर आए और इसकी परिणति यह हुई कि पहली बार देश में दक्षिणपंथ सत्ता में आया.

उसके बाद देश में कई छोटे-छोटे आंदोलन हुए, वह भी पृथकतावादी, जैसे पंजाब और असम में. अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में हुए आंदोलन में एक उम्मीद बंधी थी कि राष्ट्रीय स्तर पर कुछ बदलाव होगा. वैसा तो नहीं हुआ, लेकिन इसका असर यह ज़रूर हुआ कि इस आंदोलन के बाद जो पार्टी (भाजपा) केंद्र में कभी अपने बूते सत्ता में नहीं आई थी, वह भारी बहुमत से सत्ता में आ गई.

जब कोई भी आंदोलन अपने मूल से भटकता है, वह सत्ता परिवर्तन से खुश तो हो जाता है, लेकिन ये भूल जाता है कि सत्ता पाने की एक अनिवार्य शर्त है-व्यवस्था की बुराई से समझौता करना. ऐसे में आंदोलन के सिद्धांत बेमानी हो जाते हैं.

निश्चित तौर पर यह पार्टी दूसरे दलों के मुक़ाबले ईमानदार है. लेकिन जनता की महत्वाकांक्षाओं पर पार्टी कितनी ख़री उतरेगी यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी.

अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया

जहाँ तक आंदोलन में साथ खड़े लोगों के उसका साथ छोड़ने की बात है तो आंदोलन चलाने के लिए सिद्धांतों की और सत्ता चलाने के लिए दुनियादारों की ज़रूरत होती है.

जब सरकार चलाने के लिए दुनियादार भर लेते हैं तो सिद्धांत वाले लोग पीछे छूट जाते हैं. एक तरह से यह सत्ता और संगठन पर क़ब्ज़े की कोशिश थी.

(बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन के साथ बातचीत पर आधारित)

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