लालू-नीतीश को मोदी ने 'फिर दोस्त' बनवाया

लालू, नीतीश और मोदी
    • Author, शिवम विज
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

इस साल जून में लालू यादव ने बिहार चुनावों की ख़ातिर नीतीश कुमार का नेतृत्व ‘ज़हर का घूंट’ पीकर माना.

हालांकि नीतीश की पार्टी जनता दल यूनाईटेड में जुलाई के अंत तक इस गठबंधन पर आंतरिक बहस चलती रही थी. क्या लालू उनके लिए एक मजबूत हाथ होने की बजाय बोझ थे? क्या नीतीश अकेले दम पर चुनाव जीत सकते हैं?

यह बहस 25 जुलाई को मुजफ़्फ़रपुर में हुई नरेंद्र मोदी की पहली रैली के साथ ही समाप्त हो गई.

इस रैली के लिए बीजेपी ने पूरे पटना में नीतीश-लालू-कांग्रेस के गठबंध को अहम्, अपराध और भ्रष्टाचार के गठबंधन के रूप में चित्रित करते हुए पोस्टर और होर्डिंग्स लगाया.

यह ध्यान देने वाली बात है कि बीजेपी नीतीश पर घमंडी होने के अलावा और कोई आरोप नहीं लगा पाई. कांग्रेस के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार विरोधी भावना बुझ चुकी थी, लेकिन लालू एक समस्या बने हुए थे.

नीतीश कुमार

नीतीश कुमार खुद को इस चुनाव का चेहरा पेश करने में व्यस्त थे और इस गठबंधन का सार्वजनिक रूप से कोई दिखावा नहीं हो रहा था.

इससे ये बात चल पड़ी कि पता नहीं ये गठबंधन जमीन पर उतरेगा भी या नहीं. जबकि जदयू के भीतर भी यह वाद विवाद का विषय था.

प्रचार के स्तर पर दागदार लालू के साथ हुए गठबंधन ने बीजेपी के तरकश में कुछ हदतक सबसे ताक़तवर हथियार दे दिया.

यह एक काल्पनिक गठबंधन थाः हर मामले में नीतीश लालू से उलट थे और अब वो लालू के साथ जुड़ रहे थे.

नीतीश कुमार

अगर नीतीश अकेले लड़ते, तो जमीनी स्तर पर दिक्कतें हो सकतीं थीं. लालू यादव का दोहरा वोट बैंक - मुस्लिम और यादव दोनों ही समुदायों में धुव्रीकरण तेज होता है. यादव उस अति पिछड़ा वर्ग से अलग थलग पड़ सकते थे, जिन्हें लालू के शासनकाल के जंगल राज की अभी भी याद है.

और मुस्लिम वोट बैंक के निर्णायक रूप से एकरतफ़ा होने को, बीजेपी हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण की अपनी आजमाई नीति के लिए इस्तेमाल कर सकती थी.

अब ऊंची जातियों के वोट की बात आती है, तो अगर नीतीश कुमार लालू के साथ गठबंधन नहीं करते तो इसमें से कुछ वोट उन्हें मिल सकते थे.

हालांकि लालू के साथ गठबंधन न करना भी एक ख़तरा ही होता. हमने देखा है कि नीतीश कुमार ने 2014 के लोकसभा चुनावों में अकेले चुनाव लड़ा था.

नीतीश के पास वोट बैंक के रूप में कुर्मी वोटों की एक छोटी संख्या है. उनकी छवि के आधार पर अति पिछड़ा वर्ग, ऊंची जाति और मुस्लिम समुदाय के कुछ वोट मिल जाते लेकिन यह एक जुआ होता.

प्रशांत किशोर
इमेज कैप्शन, नीतीश कुमार के प्रचार प्रबंधक प्रशांत किशोर.

नीतीश कुमार के प्रचार अभियान के प्रबंधनकर्ता प्रशांत किशोर भी इस गठबंधन को तोड़ने के पक्ष में थे.

किशोर पहले नरेंद्र मोदी की प्रचार टीम के हिस्सा थे.

हालांकि नीतीश कुमार ने बिना गठबंधन के कभी चुनाव नहीं जीता, लेकिन किशोर को लगा कि अपनी छवि की वजह से नीतीश कुमार नवीन पटनायक की तरह प्रदर्शन दुहरा सकते हैं.

लेकिन पार्टी में अधिकांश की राय थी कि वो बिना लालू के साथ के बेहतर प्रदर्शन नहीं कर सकते. त्रिकोणीय मुक़ाबले की स्थिति में बीजेपी के लिए खुद को विजेता के रूप में पेश करने का यह बढ़िया मौका होता. लेकिन लालू के ‘जंगल राज’ की छवि से कैसे निपटा जाता.

25 जुलाई को मुजफ़्फ़रपुर में मोदी की पहली रैली एजेंडा तय करने वाली थी.

बीजेपी प्रचार अभियान को उम्मीद थी कि मोदी नीतीश-लालू गठबंधन पर हमला बोलोंगे और लोगों के ज़हन में जंगल राज की यादें ताज़ा करते हुए विकास का वादा करेंगे.

नरेंद्र मोदी

नीतीश के प्रचार अभियान को मुजफ़्फ़रपुर रैली का इंतज़ार था और इसके बाद ही कोई निर्णय लिया जाना था.

अगर लालू प्रचार के लिए बोझ बन गए थे, तो वो इस मुद्दे को बीजेपी से छीन लेना चाहते और 15 अगस्त तक लालू के साथ उनका गठबंधन टूट चुका होता.

नरेंद्र मोदी का पहुंचना एक महाकाव्यात्मक फ़िनोमिना है. मोदी की छवि एक महान वक्ता, सपनों के सौदागर, एक गेमचेंजर, इंदिरा गांधी के बाद सबसे मज़बूत प्रधानमंत्री की है. मोदी एक माहौल बनाते हैं और उसके बाद सब मोदीमय हो जाता है.

नीतीश कुमार इसके लिए पूरी तरह तैयार थे. मोदी के आने से अपने कार्यकर्ताओं को हताश न होने देने को सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने मोदी की रैली के दस दिन पहले से ही मुजफ़्फ़रपुर में व्यापक पैमाने पर घर घर और बाहर भी खूब प्रचार किया था.

नीतीश कुमार पोस्टर

मोदी के वादों की काट के लिए 25 जुलाई की सुबह सड़कों पर अचानक होर्डिंग्स दिखने लगीं, जिसमें लिखा था, "झांसे में ना आएंगे नीतीश को जिताएंगे." सुबह सुबह किए जाने वाले ट्वीट जैसे ये पोस्टर और होर्डिंग के पीछे मंशा बीजेपी को हैरान कर देने और सोचने के लिए बिल्कुल समय न देने की थी और यह किशोर की योजना का हिस्सा था.

मोदी तीन सरकारी कार्यक्रमों में लोगों को संबोधित करने के लिए पटना पहुंचने वाले थे और इसके बाद मुजफ़्फरपुर निकलने वाले थे. मोदी के पहुंचने के ठीक पहले नीतीश कुमार ने ट्विटर के माध्यम से प्रधानमंत्री पर एक के बाद एक सवाल दागे.

मोदी का स्वागत करते हुए नीतीश ने अपने भाषण में केंद्र सरकार पर जमकर हमला बोला और बिहार को लेकर हर केंद्रीय मंत्री को उनके बिहार को लेकर किए वादों की याद दिलाई.

मोदी ने मुजफ़्फ़रपुर में अपने भाषण की शुरुआत नीतीश कुमार के ट्वीट का संदर्भ लेते हुए की. इस बात का यह पहला संकेत था कि नीतीश कुमार की रणनीति काम कर गई.

नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार

मोदी पहले ही बैकफ़ुट पर थे, जिसने नीतीश कुमार को प्रतिक्रिया देने के लिए मज़बूर किया.

इसके बाद मोदी ने एक बड़ी ग़लती की. उन्होंने रैली की शुरुआत नीतीश पर तीखा व्यक्तिगत हमला बोलकर किया. ऐसा लगा मानो यह चुनाव व्यक्तिगत रंजिशों को निपटाने के लिए था. “मुझसे बिहार में आने के लिए मना किया गया, मेरी बेइज्जती की गई, उन्होंने व्यक्तिगत अहम के लिए गठबंधन तोड़ा, उन्होंने जीतन राम मांझी जैसे महादलित का अपमान किया.”

ऐसा लगता है कि मोदी ने कहा कि नीतीश के डीएनए में ख़राबी है.

इसके बाद मोदी ने गठबंधन पर हमला बोला और जंगल राज के बारे में बात की, लेकिन जदयू कैंप को वो मिल गया था, जो वो चाहते थे.

जैसे ही मोदी दिल्ली लौटे, नीतीश कुमार ने एक प्रेस कांफ्रेंस कर डीएनए की टिप्पणी के लिए मोदी पर हमला बोल दिया.

बिहार डीएनए मुद्दा

नीतीश के प्रचार अभियान ने बिहारी डीएनए को एक मुद्दा बना दिया और इस बात को सुनिश्चित कर दिया कि डीएनए के अलावा मोदी ने जो कुछ कहा वो इस शोर में गुम हो जाए.

यह प्रेस कांफ्रेंस जानबूझ कर तब बुलाई गई जब मोदी दिल्ली जाने वाले जहाज पर सवार थे, ताकि वो इस दौरान अपने सलाहकारों से सलाह न ले पाएं और तत्काल प्रतिक्रिया को अमली जामा न दे पाएं.

हो सकता है कि डीएनए मुद्दे का वोटरों के बीच बहुत थोड़ा असर हुआ हो लेकिन प्रचार अभियान के स्तर पर यह अपना काम कर गया.

इसके दूसरे दिन अख़बारों में डीएनए सुर्खियों में छाया रहा और जंगल राज से लोगों का ध्यान हटाने में सफल रहा.

और इसके साथ ही नीतीश और लालू गठबंधन पर मुकम्मल मुहर लग गई.

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