मोदी को ‘जिताने’ वाले ने नीतीश को जिताया

    • Author, शिवम विज
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
  • प्रकाशित

बिहार में महागठबंधन का प्रचार अभियान काफ़ी चुस्त-दुरुस्त नज़र आया, इतना ही नहीं ये अपने रंगों की वजह से भी ध्यान खींचता रहा.

रंग दरअसल पार्टियों की सोची-समझी ब्रैंडिग स्ट्रेटेजी का हिस्सा होते हैं, और इन रंगों के पीछे दिमाग़ है प्रशांत किशोर का जो 2014 के आम चुनाव में मोदी के रणनीतिकार थे.

इस बार वे नीतीश की टीम का हिस्सा थे और उन्होंने नीतीश-लालू के अभियान को कई मायनों में बदला.

इस बार चटक रंगों ने नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) और लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल की ओर से पहले इस्तेमाल किए जा रहे बोरिंग हरे और सफ़ेद रंग की जगह ली.

इस रणनीति को तैयार करते वक्त प्रशांत किशोर को ये अंदाज़ा था कि मुक़ाबला बीजेपी के भगवा रंग से होना है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत करते नीतीश कुमार.

किशोर की टीम के एक सदस्य ने चुनाव अभियान के दौरान बीबीसी से कहा था, "केसरिया रंग काफी चमकदार है और बीजेपी का अभियान इसलिए भी काफी चमक-दमक वाला दिखता है. ऐसे में हमें कहीं ज़्यादा चमक-दमक वाले रंग का इस्तेमाल करना था, इसलिए हमने अभियान के दौरान लाल और पीले रंग का इस्तेमाल किया है."

दिसंबर, 2014 में उन्होंने मोदी का दामन छोड़कर नीतीश कुमार की मदद शुरू की थी, उनके मोदी खेमा छोड़ने की वजह अमित शाह से मिली उपेक्षा बताई जाती है.

यही वजह है कि प्रशांत किशोर इस चुनाव में ख़ुद को साबित करना चाहते थे.

कहा जा रहा है कि प्रशांत किशोर की टीम वही सब किया जो अमित शाह की टीम ने पटना में किया - बूथ स्तर तक के आंकड़ों का विश्लेषण, मतदाताओं को आकर्षित करने वाले अभियान, स्वयंसेवकों का प्रबंधन और सोशल मीडिया पर साथी जुटाना.

प्रशांत किशोर की टीम ये सब पटना सिटी के आईपीएसी दफ़्तर में किया. किशोर ख़ुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सरकारी निवास में बैठकर अभियान की रूपरेखा तय करते रहे हैं

बताया जाता है कि किशोर ने इस बात जोर डाला था कि जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहिए और नीतीश कुमार को फिर से मुख्यमंत्री बनना चाहिए. यह फरवरी, 2015 में हुआ. इसके बाद किशोर ने अगले छह महीने में नीतीश कुमार को न केवल पार्टी के चेहरे के तौर पर प्रचारित किया बल्कि सरकार, सुशासन, विकास और बिहार की ब्रैंडिंग की.

भारतीय जनता पार्टी को इससे महादलित नेता के तौर पर जीतन राम मांझी ज़रूर मिल गए, लेकिन वह इस बात का आकलन नहीं कर पाई कि नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद पर वापस लौटने से आम मतदाताओं में नीतीश की लोकप्रियता कितनी बढ़ी है.

प्रशांत किशोर ने नीतीश को फिर से आम लोगों के नेता के तौर पर प्रचारित किया, मोदी से हारने वाली छवि कहीं पीछे छूट गई.

इस अभियान की शुरुआत में पार्टी के कार्यकर्ता लोगों के घर-घर तक गए, इस अभियान का नाम ही था ‘घर-घर दस्तक’. वे आम लोगों से बस यही पूछ रहे थे - बीते दस सालों में आपके क्षेत्र में विकास हुआ है या नहीं? नीतीश कुमार ने बिहार के विकास के लिए काम किया है या नहीं?

इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल इतना भर था कि लोगों के दिमाग में नीतीश कुमार की 2014 लोकसभा चुनाव से पहले वाली छवि ध्यान में रहे, बिहार को अंधेरे से रोशनी में लाने वाले नेता की छवि.

इसके बाद किशोर की टीम ने नीतीश कुमार को फ़ीडबैक दिया कि नाराज़ मतदाताओं को ख़ुश करने के लिए क्या करने की जरूरत है. इसमें पैरा-टीचरों की नौकरियों को स्थायी बनाने, किसानों की समस्याओं को हल और सरकारी अनुबंधों में जाति आधारित आरक्षण देने जैसे सुझाव शामिल थे.

बिहार में बीजेपी ने महागठबंधन की तुलना में जल्दी-जल्दी अपने नारे बदले. वहीं दूसरी ओर, प्रशांत किशोर ने पिछले कुछ महीनों में 3-4 नारों का ही इस्तेमाल किया. नारों में केवल एक गीत का इस्तेमाल हुआ.

बीजेपी के संसाधनों के सामने महागठबंधन के पास संसाधनों की कमी को देखते हुए प्रशांत किशोर ने टीवी और प्रिंट विज्ञापन पर एक पैसा नहीं खर्च करने का फैसला लिया. उम्मीदवार अपना प्रचार खुद से कर सकते थे. दूसरी ओर बीजेपी ने पूरे पन्ने के विज्ञापन दे रही है.

यह एक रणनीतिक फ़ैसला था, जेडीयू-राजद-कांग्रेस के पास टीवी-प्रिंट विज्ञापन देने के लिए बीजेपी जितना पैसा नहीं था. बीजेपी की तुलना में कम विज्ञापन देने से महागठबंधन कमज़ोर लगने लगा. इससे बीजेपी की धारणा मजबूत हुई कि चुनाव में उनका पलड़ा भारी है.

प्रशांत किशोर ने इसकी जगह उन पैसों का इस्तेमाल बीजेपी का जवाब देने के लिए रेडियो विज्ञापन दिए और स्वयंसेवियों को तैयार किया. स्वयंसेवियों के लिए तीन रणनीतियां बनाई गईं, इनमें नीतीश कुमार का पत्र लेकर स्वयंसेवियों को दरवाजे- दरवाजे तक भेजा गया. इसमें एक नंबर पर मिस्ड कॉल्स करने की अपील की गई थी. इसके जवाब में उन्हें नीतीश कुमार का रिकॉर्डेड कॉल किया जाता था.

ग्रामीण स्तरों पर बीजेपी की तरह वीडियो रथ की व्यवस्था की गई, जिसमें 45 मिनट के वीडियो में मोदी सरकार पर हर मोर्चे पर आलोचना की गई है, ललितगेट से लेकर व्यापाम तक और बैंक खातों में 15 लाख रुपये आने के वादे तक की आलोचना की गई.

पहले ये आशंका जताई जा रही थी कि महागठबंधन के सहयोगी दलों के चुनावी अभियान में सामंजस्य नहीं हो पाएगा. यही वजह है कि किशोर ने इस बात पर जोर दिया कि महागठबंधन अपने सभी 243 उम्मीदवारों की घोषणा एक साथ करे.

किशोर ने पर्दे के पीछे काम करते हुए महागठबंधन के सभी तीन दलों को आंकड़ों के साथ किन सीटों पर चुनाव लड़ना है, उसके बारे में सलाह दी और दो सप्ताह के अंदर ही सभी मतभेदों का निपटारा कर दिया.

नीतीश कुमार.

प्रशांत किशोर ने ये भी सुनिश्चित किया कि नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव एक साथ बहुत ज़्यादा रैलियों में नहीं जाएं क्योंकि दोनों नेताओं की स्टाइल अलग थी, उनके श्रोता अलग-अलग हैं और जातिगत पकड़ भी अलग-अलग है.

ऐसे में, प्रशांत किशोर ने तय किया कि वे दोनों अलग-अलग सभी 243 क्षेत्रों में एक बार जरूर जाएं. नीतीश जहां अपने भाषणों में विकास की बात करते दिखे वहीं लालू सामाजिक न्याय और जातिगत ध्रुवीकरण पर जोर देते रहे. इसके पीछे विचार यही था कि दोनों नेता एक दूसरे के पूरक नजर आएं.

इस रणनीति के जरिए किशोर ने बीजेपी के नीतीश के चाराघोटाले में दोषी करार दिए गए लालू से हाथ मिलाने की आलोचना का करारा जवाब दे दिया.

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