भागलपुर दंगाः मुस्लिम वोटरों को खींचने की कोशिश

 नीतीश कुमार
    • Author, राजेन्द्र तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
  • प्रकाशित

बिहार में विधानसभा के चुनाव नज़दीक हैं और सभी दल अपने वोट बैंक को सजाने संवारने में लग गए हैं.

हाल ही में बिहार की नीतीश सरकार ने भागलपुर दंगे की जांच रिपोर्ट जारी कर दी है.

इस रिपोर्ट को भी चुनाव से जोड़ कर देखा जा रहा है. ये दंगे क़रीब 25 साल पहले 1989-90 में हुए थे.

एक सदस्यीय भागलपुर सांप्रदायिक दंगा न्यायिक जांच आयोग का गठन फ़रवरी, 2006 में नीतीश सरकार ने किया था.

इस जांच रिपोर्ट में उन मामलों का तफ़सील से ज़िक्र किया गया है, जिन्हें दर्ज किया गया और जिनमें कार्रवाई हुई.

रिपोर्ट में कहा गया है कि उस समय सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार और मुख्य रूप से एसपी (ग्रामीण) शीलवर्द्धन सिंह को दोषी क़रार दिया गया है और कार्रवाई किए जाने की सिफ़ारिश की है.

मुख्य दोषी आईबी में

भागलपुर दंगा

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भागलपुर शहर और तत्कालीन भागलपुर ज़िले के 18 प्रखंडों के 194 गांवों में दंगों में 1100 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

दंगा पीड़ितों के मुताबिक़ लगभग छह महीने तक ये दंगे होते रहे थे.

हालांकि यह रिपोर्ट बीती फ़रवरी में ही सरकार को सौंप दी गई थी, लेकिन अभी एक हफ़्ते पहले ही इसे कैबिनेट के सामने रखा गया है.

और सरकार ने विधानसभा के वर्तमान सत्र के आख़िरी दिन इसे सदन में पेश किया.

इस रिपोर्ट में जिस अधिकारी को मुख्य रूप से दोषी माना गया है वो इस समय इंटेलिजेंस ब्यूरो में हैं और उस समय जो भागलपुर के एसपी थे, वो इस समय एडीजी (ट्रेनिंग) हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि एसपी (ग्रामीण) की वजह से ही ग्रामीण इलाक़ों में दंगा फैला.

ये ध्यान देने वाली बात है कि उस समय एसपी (ग्रामीण) की कोई पोस्ट नहीं हुआ करती थी और जब दंगा भड़का उसके बाद यह पद बनाया गया था और एक अधिकारी को इसकी ज़िम्मेदारी दी गई.

इस रिपोर्ट में उसी अधिकारी को दोषी क़रार दिया गया है.

चुनाव

नीतीश कुमार

डेढ़ दो हफ़्ते में ही राज्य में चुनाव की घोषणा होने वाली है. ऐसे समय में इस रिपोर्ट को जारी करने से जदयू को कुछ ख़ास असर होता नहीं दिखता.

इससे नीतीश कुमार को हालफ़िलहाल कोई ख़ास फ़ायदा नहीं होने वाला है. चुनाव की घोषणा के लिए समय बहुत कम बचा है इसलिए रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई होगी इसकी भी उम्मीद बेहद कम है.

लेकिन इसके मार्फ़त नीतीश कुमार ने ये बताने की कोशिश की है कि उनकी सरकार ने मुसलमानों के लिए क्या क्या किया.

जैसे, इस दंगे में कामेश्वर यादव नाम के एक आदमी को अभियुक्त ठहराया गया था. लेकिन उस समय लालू यादव की जनता दल सरकार आई तो कामेश्वर को बरी कर दिया गया.

मुस्लिम वोट बैंक

भागलपुर दंगा पीड़ित

यही नहीं, पुलिस ने कामेश्वर यादव को साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए प्रशस्ति पत्र तक दिया.

लेकिन नीतीश कुमार की सरकार आई तो फ़ाइलें दोबारा खुलीं और फिर से मामला दर्ज हुआ और उन्हें सज़ा हुई. वो आज जेल में हैं.

कुल मिलाकर इस रिपोर्ट का नीतीश कुमार के लिए तात्कालिक कोई फ़ायदा नज़र नहीं आता.

लेकिन लंबे समय में, नीतीश द्वारा राजद का वोट बैंक माने जाने वाले मुस्लिम वोटरों को अपनी ओर खींचने की कोशिश मानी जा रही है.

(बीबीसी संवाददाता मोहनलाल शर्मा से बातचीत के आधार पर)

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>