इफ़्तार पार्टियों से मोदी दूर क्यों?

    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
  • प्रकाशित

रमज़ान के महीने में इफ़्तार की दावतों का सिलसिला चल रहा है. लगभग सभी बड़ी पार्टियों के नेता इफ़्तार पार्टी देने में बढ़-चढ़ के हिस्सा ले रहे हैं.

लेकिन मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी तक कोई इफ़्तार पार्टी नहीं दी है.

तो क्या मोदी मुसलमान विरोधी हैं, और क्या इफ़्तार की दावतों और सियासत के बीच कोई संबंध है?

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कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की हालिया इफ़्तार पार्टी की तस्वीरों को देखा. कोई मुसलमान चेहरा नज़र नहीं आया.

एक साहब सोनिया जी के बग़ल में टोपी लगाए बैठे थे. मैंने सोचा शायद मुसलमान हों लेकिन गौर से देखा तो वो तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओब्रायन निकले.

इसके बाद पता चला कि जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्लाह जैसी चुनिंदा मुसलमान हस्तियां वहां मौजूद थीं.

माँ ये तस्वीरें देखतीं तो कहतीं: "इफ़्तार की दावत देने वाली ग़ैर मुसलमान, इफ़्तार खाने वाले अधिकतर ग़ैर मुसलमान तो इस इफ़्तार के मायने क्या? इफ़्तार तो रोज़ेदारों के लिए होता है."

मुझे याद है कि बचपन में इंदिरा गांधी की इफ़्तार पार्टियों पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती थी: 'ये तो केवल नाटक है, ढकोसला है.'

उनकी ख़ामोशी

शायद इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इफ़्तार पार्टी की दावत नहीं देते? और इस तरह के 'नाटक और ढकोसले' वाली इफ़्तार पार्टियों में नहीं जाते?

या फिर इफ़्तार से उसी तरह से दूर रहते हैं जिस तरह से वो मुसलमान 'टोपी' को सर पर रखने से परहेज़ करते हैं?

मोदी ने पिछली 'मन की बात' में राखी की बधाई दी लेकिन रमज़ान के पवित्र महीने पर ख़ामोश रहे.

इन बातों को लेकर भारत के मुसलमानों को मोदी जी से शिकायत है.

लेकिन इफ़्तार पर उनका स्टैंड ग़लत नहीं है. उनकी कई बातों पर आम असहमति बनी है लेकिन इफ़्तार पर उनकी ख़ामोशी पर किसी को ऐतराज़ नहीं होना चाहिए.

वो इसलिए कि दशकों से सभी पार्टियों और नेताओं ने इफ़्तार पार्टियां या तो वोट बैंक के लिए आयोजित की हैं या फिर सत्तारूढ़ सरकार के विरुद्ध विपक्ष की एकता बनाने की कोशिश के लिए. इसमें कांग्रेस हमेशा से आगे आगे रही है.

एक रोज़ेदार मुसलमान ने मुझसे कहा कि कांग्रेस को सेकुलरिज्म के नाम पर अगर इफ़्तार पार्टियां देनी ही है तो हिन्दू-मुसलमान एकता बढ़ाने के लिए इफ़्तार पार्टी दो. गांधी जी की 'सर्व धर्म समभाव' की भावना के नाम पर इफ़्तार पार्टी करो.

मुसलमानों को 'सलाम'

प्रधानमंत्री अगर इफ़्तार पार्टियों से दूर रहते हैं तो कोई बात नहीं. आज यानी बुधवार को राष्ट्रपति भवन की इफ़्तार पार्टी में नहीं जाते हैं तो मुसलमानों का इससे दिल छोटा नहीं होना चाहिए.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक प्रचारक के सामने जब मैंने मोदी जी और इफ़्तार पार्टियों में उनकी ग़ैरहाज़िरी वाली बात छेड़ी तो उन्होंने कहा कि इसका मतलब ये न निकालो कि वो मुसलमान विरोधी हैं.

उस प्रचारक ने दावा किया कि रमज़ान शुरू होने से पहले इसकी बधाई उन्होंने तमाम मुसलमान देशों को दी थी.

जब पिछले हफ़्ते वो मुसलमान देश उज़्बेकिस्तान गए तो उन्होंने वहां के मुसलमानों को सोशल मीडिया पर 'सलाम' कहा था.

इसके अलावा पिछले महीने उन्होंने दिल्ली के इस्लामिक सेंटर जाकर एक मुसलमान लेखक की पुस्तक जारी की थी.

अलग-थलग

इस समारोह में अधिकतर मुसलमान थे जहाँ मोदी जी ने भारत के मुसलमानों को पढ़ाई-लिखाई में पिछड़ेपन से बाहर निकलने को कहा था.

मेरे एक मुसलमान दोस्त ने कहा कि वो प्रधानमंत्री की नसीहत से सहमत है. लेकिन उसके अनुसार प्रधानमंत्री का भी फ़र्ज़ बनता है कि वो मुसलमानों को ज्ञान प्राप्त कराने के लिए ठोस क़दम उठाएं.

उसने आगे कहा, 'इफ़्तार पार्टी न दें. इफ़्तार पार्टी में शामिल न हों. उनके राज में इस देश का मुसलमान समुदाय ख़ुद को अलग-थलग महसूस करने लगा है, वो हाशिए पर आ गया है. उसे सरकारी सेकुलरिज़्म नहीं सरकारी मदद चाहिए.'

और ये मोदी जी तो ख़ुद जानते हैं. तो देर किस बात की. क्या वो इफ़्तार के बजाय मुसलमानों की शिक्षा और रोज़गार में भागीदारी बढ़ाने की ज़िम्मेदारी उठाएंगे?

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