आबादी के हिसाब से सबसे ज़्यादा जवान कहां?

छत्तीसगढ़, माओवाद, सुरक्षा कर्मी
    • Author, आलोक प्रकाश पुतुल
    • पदनाम, रायपुर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

अगर आप सोचते हैं कि देश में आबादी के हिसाब से सबसे अधिक पुलिस जवानों की संख्या दिल्ली में होगी, तो आप ग़लत हैं.

सही जवाब है-छत्तीसगढ़ का बस्तर.

भारत में औसतन प्रति एक लाख लोगों की सुरक्षा के लिए पुलिस जवानों की संख्या 139 के आसपास है.

लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर के सात ज़िलों में यह आंकड़ा है लगभग 1774. यानी 56 लोगों पर एक पुलिस वाला.

अगर आप 2011 के अफगानिस्तान में संघर्ष के दिनों को याद करें, तो वर्ल्ड बैंक के एक आंकड़े के अनुसार उस दौर में वहां 73 लोगों पर एक जवान की तैनाती थी.

'अपर्याप्त है फ़ोर्स'

छत्तीसगढ़, माओवाद, सुरक्षा कर्मी

बस्तर में 56 लोगों की जनसंख्या पर एक पुलिस वाले का यह आंकड़ा तब है, जब केंद्र सरकार अभी सुरक्षा बलों की कुछ और बटालियन जल्दी ही छत्तीसगढ़ भेजने वाली है.

राज्य में नक्सल ऑपरेशन के उप पुलिस महानिदेशक आरके विज कहते हैं, "बस्तर का जो भौगोलिक विस्तार है और जो परिस्थितियां हैं, वहां के हिसाब से पुलिसबल की यह संख्या अब भी अपर्याप्त है."

माओवाद प्रभावित बस्तर की कुल आबादी 31 लाख के आसपास है. वर्ष 2003 में माओवादियों के खिलाफ शुरु हुए अभियान के बाद बस्तर में राज्य पुलिस के अलावा केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की संख्या बढ़ती चली गई.

2005 में जब सरकार के संरक्षण में सलवा जुडूम (यानि शांति यात्रा) की शुरुआत हुई तो नागा बटालियन से लेकर भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के जवानों को भी सलवा जुड़ूम के साथ उतार दिया गया.

छत्तीसगढ़, माओवाद, सुरक्षा कर्मी

फिर गांव-गांव में माओवादियों और उनके समर्थकों पर हमला बोलने का सिलसिला शुरू हुआ.

वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सलवा जुडूम को बंद करना पड़ा. लेकिन केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और राज्य पुलिस का माओवादियों के खिलाफ अभियान जारी रहा और सुरक्षा बलों की संख्या बढ़ती गई.

'आसान नहीं मुकाबला'

आज की तारीख़ में बस्तर में केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के लगभग 35 हज़ार और राज्य पुलिस के लगभग 20 हज़ार जवान तैनात हैं.

बस्तर के आईजी एसआरपी कल्लूरी कहते हैं, "पहले फोर्स को हम लड़ने के लिए, ऑपरेशन के लिए, कार्रवाई के हिसाब से मांगते थे. लेकिन अब हमें लड़ाई के लिए नहीं, विकास के लिए फोर्स की ज़रूरत है. इन इलाकों में फोर्स की देखरेख में सड़कें बन रही हैं और यह सड़कें माओवादियों के सीने में तलवार की तरह हैं."

छत्तीसगढ़, माओवाद, सुरक्षा कर्मी

हालांकि माओवादी मामलों के जानकार पत्रकार रुचिर गर्ग का मानना है कि अकेले पुलिस बल की संख्या बढ़ा लेने भर से बस्तर में माओवादियों से मुकाबला संभव नहीं है.

रुचिर गर्ग कहते हैं, "बस्तर में जो लड़ाई चल रही है, उसमें जिसके पास अधिक से अधिक असलहा होगा, हथियार होंगे, लड़ाके होंगे, उसको उतना लाभ तो होगा ही. इसलिए अधिक से अधिक संख्या में फोर्स की तैनाती के फायदे अपनी जगह हैं."

"लेकिन इस लड़ाई को कई मोर्चों पर लड़ने की ज़रुरत है. उन मोर्चों पर काफी कुछ किया जाना बाकी है. ये मोर्चे राजनीतिक भी हैं और रणनीतिक भी हैं."

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