अमित शाह की रणनीति की धार कुंद?

नरेंद्र मोदी, अमित शाह
    • Author, सिद्धार्थ वरदराजन
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
  • प्रकाशित

राजनीति में 10 महीने का समय लंबा होता है.

लगता है भारतीय जनता पार्टी को राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर एक के बाद एक जीत दिलाने वाले अध्यक्ष अमित शाह की आक्रामक प्रचार और गुप्त साज़िशों की रणनीति चुकने लगी है.

क्या दिल्ली की हार का असर बिहार की राजनीति पर पड़ेगा और क्या मोदी व अमित शाह की जोड़ी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को सीधी टक्कर दे सकेगी?

पढ़िए पूरा विश्लेषण

सतीश उपाध्याय, अमित शाह, नरेंद्र मोदी

दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने भाजपा के मुख्य रणनीतिकार अमित शाह को अपमानजनक हार दी तो बिहार में नीतीश कुमार की वापसी ने इस साल होने वाले चुनाव से पहले जनता दल तोड़ने के शाह की योजना को पलीता लगा दिया है.

समर्थन देने के भाजपा के ऐलान के बावजूद जदयू के बाग़ी मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने विश्वास मत की परीक्षा देने के बजाय राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी को इस्तीफ़ा सौंपना पसंद किया.

अब शाह की सारी उम्मीदें पूर्व मुख्यमंत्री मांझी के अपनी पार्टी बनाने पर टिकी हैं.

राज्य में नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस के दुर्जेय गठबंधन से पार पाने के लिए भाजपा को इसकी पटकथा लिखनी ही पड़ी ताकि मांझी के ज़रिए महादलित आबादी को रिझाया जा सके.

जीतनराम मांझी

हालांकि यह साफ़ नहीं है कि मांझी भाजपा को उपकृत करते रहेंगे.

अगर उन्होंने भाजपा के इशारों पर जदयू से संबंध तोड़ा है तो राजनीतिक पर्यवेक्षक शुक्रवार की प्रेस कॉन्फ्रेंस में जदयू को लेकर उनके मैत्रीपूर्ण लहज़े की बात कर रहे हैं.

बिहार की आज की राजनीति के उथल-पुथल भरे दौर में उनकी 'घर वापसी' की संभावना को भी ख़ारिज नहीं किया जा सकता है.

अमित शाह जानते है कि जिस तरह उनकी पार्टी दिल्ली में आर-पार की लड़ाई में विरोधियों के हमले के आगे नहीं टिक पाई उसी तरह बिहार में यदि विरोधी खेमा एकजुट रहा तो भाजपा का पत्ता साफ़ हो जाएगा.

'केजरीवाल नहीं हैं नीतीश'

नीतीश कुमार

साल 2014 में जब मोदी लहर चरम पर थी, भाजपा को बिहार में 29.4 फ़ीसदी वोट मिले थे. इसके सहयोगियों रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को 9.4 फ़ीसदी मत मिले थे.

इन 38.8 फ़ीसदी वोटों के बदौलत एनडीए ने राज्य की 40 में से 31 सीटों पर क़ब्ज़ा कर लिया था. दूसरी अोर, जदयू, राजद और कांग्रेस कुल मिलाकर 45 फ़ीसदी वोट हासिल करने के बावजूद सिर्फ़ आठ सीटें ही जीत सकी थीं. इसका कारण भाजपा-विरोधी वोटों का बंटा होना था.

राज्य नेतृत्व की कमज़ोरी को देखते यह मुश्किल लगता है कि भाजपा नीतीश के नेतृत्व वाले महागठबंधन का मुक़ाबला कर सकेगी.

यक़ीनन, जदयू को सत्ता विरोध का सामना करना पड़ेगा और जटिल जातीय समीकरणों की वजह से गठबंधन में शामिल दलों के बीच वोटों की अदलाबदली भी आसानी नहीं होगी.

लालू, नीतीश

अगर महादलित मांझी को बाहर किए जाने से अपमानित महसूस करते हैं तो इससे जदयू के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी.

हालांकि जदयू दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के प्रदर्शन से उत्साहित हो सकती है, पर नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल नहीं हैं.

कुछ भी हो, जदयू को तोड़ने की भाजपा की गंदी चालें और राजनीतिक फ़ायदे के लिए मांझी के कुशासन को चलाते रहने की उसकी कोशिशों से जदयू को फ़ायदा मिल सकता है.

मांझी कार्ड के अलावा भाजपा जानती है कि उसे धार्मिक ध्रुवीकरण से भी सियासी फ़ायदा मिल सकता है.

यहां अमित शाह की 'कुछ भी चलता है' वाली राजनीति का प्रधानमंत्री मोदी के 'सबके साथ' वाले नारे के साथ टकराव होगा और इससे भाजपा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर मुश्किलें पैदा होंगी.

बंगाल की टक्कर

ममता बनर्जी

अगर अमित शाह के चुनाव प्रबंधन के लिए सबसे पहले मिलने वाली चुनौती बिहार है तो पश्चिम बंगाल एक ऐसा राज्य है जहां कम से कम काग़ज़ों पर पार्टी की संभावनाएं काफ़ी बेहतर नज़र आती हैं.

लोकसभा चुनावों में पार्टी उल्लेखनीय रूप से 17 फ़ीसदी मत हासिल करने में कामयाब रही थी, जो माकपा से सिर्फ़ छह फ़ीसदी कम थे. तृणमूल कांग्रेस 39.8 प्रतिशत वोट के साथ बहुत आगे थी, पर भाजपा ने राज्य में हाल ही में हुए दो उपचुनावों बनगांव और कृष्णगंज में इस अंतर को काफ़ी कम कर दिया.

वाम दलों के गिरते मत प्रतिशत के बीच भाजपा ने इन दोनों सीटों पर क्रमशः 25.4 और 29.5 फ़ीसदी वोट हासिल किया. यह इन्हीं विधानसभा क्षेत्रों में 10 महीने पहले हासिल मतों से ज़्यादा है.

वाम दलों के मतों की क़ीमत पर भाजपा के वोट बढ़ते जाने से पारंपरिक समझ यह कहती है कि तृणमूल के साथ उसकी सीधी टक्कर में पार्टी को फ़ायदा होगा.

लेकिन अमित शाह को अहसास है कि ममता बनर्जी जिन 40 फ़ीसदी मतों को अब भी खींच रही हैं उनसे पार पाने के लिए वाम दलों के ढ़हने से ज़्यादा कुछ चाहिए.

मुकुल रॉय

वाम दलों के पतन का मतलब यह हुआ कि भाजपा ममता-विरोधी मतों के बड़े हिस्से पर दावा कर सकती है. पर इसके साथ ही ममता बनर्जी को भी यह हक़ मिल जाता है कि वह मोदी और भाजपा विरोधी मतों की दावेदार बनें और यह तृणमूल, वामदलों के बीच न बंटे.

सीबीआई शारदा चिट फ़ंड घोटाले की जांच कर रही है. ऐसे में, इसका कथित राजनीतिक इस्तेमाल तृणमूल में विभाजन की कोशिश नज़र आता है.

बिहार में मांझी की तरह ही पश्चिम बंगाल में पार्टी नेता मुकुल राय को विद्रोह करने के लिए उकसाया जा रहा है.

लेकिन मांझी के पास संगठनात्मक कौशल नहीं के बराबर था और वह भाजपा को वह परिणाम नहीं दिला सके जिसकी उम्मीद थी. इसके विपरीत राय का विद्रोह तृणमूल पर काफ़ी भारी पड़ सकता है.

पर राज्य भाजपा के नेताओं को यह चिंता भी है कि उनके ऊपर किसी बाहरी आदमी को बिठाया जा सकता है. ऐेसे में पार्टी में जगह बनाना राय के लिए बहुत आसान नहीं होगा.

सीबीआई का कोड़ा

सीबीआई

फ़िलहाल ममता बनर्जी की प्राथमिकता यह है कि पार्टी अप्रैल या मई में होने वाले कोलकाता नगर निगम और दूसरे जगहों के स्थानीय निकायों के चुनाव ठीक से जीत जाए.

केजरीवाल से सबक लेकर उन्होंने कहा है कि अब पानी पर टैक्स नहीं लगाया जाएगा. वह ऑटो और टैक्सी चालकों को भी लुभाने की कोशिश कर रही हैं.

यदि तृणमूल इन स्थानीय निकायों के चुनाव अपने दम पर जीत जाती है तो इसकी भी संभावना है कि ममता बनर्जी साल के अंत तक विधानसभा चुनावों का ऐलान कर दें. यह मुमिकन है कि वह बिहार चुनाव के समय ही अपने यहां भी चुनाव कराएं और 2016 में वर्तमान विधानसभा के कार्यकाल ख़त्म होने का इंतज़ार न करें.

पश्चिम बंगाल में मोदी और शाह ने सीधे ममता बनर्जी को चुनौती दे दी है. पर मुमकिन है कि उनकी आक्रामक रणनीति पार्टी के लिए नुक़सानदेह साबित हो.

पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल के साथ ही असम और ओड़ीशा की राजनीतिक ज़मीन भाजपा के लिए बहुत माकूल है क्योंकि इन राज्यों में दो दलों की पारंपरिक व्यवस्था ख़त्म हो गई है.

माना जा रहा है कि असम कांग्रेस के नेता हेमंत बिश्व शर्मा शारदा घोटाले में नाम आने के बाद भाजपा के दरवाज़े खटखटा रहे हैं. यह साफ़ नज़र आ रहा है कि भारतीय जनता पार्टी विरोधी दल में विद्रोह को बढ़ावा देकर और सीबीआई का फ़ायदा उठाकर अपनी स्थिति मज़बूत करे.

इससे पार्टी को तात्कालिक फ़ायदा तो मिल सकता है, पर लंबे समय में इसका फ़ायदा होने की उम्मीद नहीं है.

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