गुजरात का दूसरा पहलू: कमज़ोर और कुपोषित बच्चे, महिलाएं

गुजरात कुपोषित बच्चे
    • Author, दिव्या आर्य
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, गुजरात से
  • प्रकाशित

चकुनाबेन बलवंत 16 साल की थीं जब उनकी शादी हो गई. 18 साल की उम्र में पहला बच्चा हुआ और 22 साल की उम्र में दूसरे बच्चे के साथ गर्भवती चकुनाबेन की मौत हो गई.

गुजरात के सबसे ग़रीब ज़िले पंचमहल के चांठा गांव की रहने वाली चकुनाबेन का परिवार पहले उन्हें 40 किलोमीटर दूर के स्वास्थ्य केंद्र में ले गया और फिर उससे 40 किलोमीटर दूर एक ग़ैर सरकारी संस्था के क्लीनिक में.

पर वहां भी डॉक्टरों ने कहा कि चकुनाबेन इतनी कमज़ोर थीं कि उनका सीज़ेरियन भी नहीं हो सकता था, और उन्हें बड़े अस्पताल में ले जाना होगा. पर इसी क्लीनिक की सीढ़ी उतरते हुए उनकी मौत हो गई.

दिसंबर में चकुनाबेन की मौत के बाद से अब तक उन्हीं के गांव में चार और महिलाओं की बच्चा जनने से पहले या जनते समय मौत हो गई.

चकुनाबेन की रिश्तेदार शारदा बताती हैं, "वह शादी करके आई थीं तभी कमज़ोर थीं. यहां कम उम्र में बच्चा पैदा करना पड़ता है और नज़दीक के स्वास्थ्य केंद्र में महिला डॉक्टर भी नहीं रहतीं, ऐसे में सेहत और पोषण पर कोई ध्यान नहीं देता."

न पानी, न रोज़गार?

गुजरात, कुपोषित महिला की मौत

भारत की मानव विकास रिपोर्ट (2011-12) के मुताबिक़ गुजरात में 50 फ़ीसदी से भी ज़्यादा महिलाओं में और पांच साल से कम की उम्र के क़रीब 70 फ़ीसदी बच्चों में एनीमिया यानी ख़ून की कमी है.

रिपोर्ट तो यहां तक कहती है कि ज़्यादा औद्योगिक विकास और प्रति व्यक्ति आय वाले सभी राज्यों में से, गुजरात, भूख़ और कुपोषण के मामले में सबसे आगे है.

पंचमहल से सटा दाहोद भी आदिवासी इलाक़ा है. इस इलाक़े के कांसतिया गांव में रहने वाली खमिता का गर्भ पांच महीने का है.

घर में पीने का पानी नहीं आता है, तो सुबह छह बजे उठकर खमिता कुंए से पानी भरने की कवायद शुरू करती हैं. इलाक़ा पहाड़ी है और दिन में तापमान 43 डिग्री तक पहुंच जाता है.

एक मटकी सर पर टिकाए और एक हाथ में लिए खमिता, अपनी झोपड़ी से कुंए की एक किलोमीटर की दूरी लगभग 20 बार तय करती हैं.

गुजरात, कुपोषित गर्भवती महिला
इमेज कैप्शन, खमिता गर्भवती हैं. लेकिन उन्हें दिन भर घर के काम और मज़दूरी तक में लगे रहना पड़ता है.

फिर खाना, बरतन, कपड़े वगैरह निबटाकर दूसरों के खेत में मज़दूरी करने जाती हैं. बताती हैं कि यह सिलसिला आठवें महीने तक चलेगा. पिछले पांच बच्चों को पैदा करते हुए भी ऐसा ही था.

36 साल की खमिता ख़ुद काफ़ी कमज़ोर हैं, थोड़ा हिचकिचाते हुए कहती हैं, "एक बच्चा तो पैदा होने के बाद मर गया था अब घर में सास-ससुर और बाक़ी बच्चों समेत हम आठ जन हैं. पति मज़दूरी करते हैं, फिर भी कम पड़ता है. मैं आराम कैसे कर सकती हूं, सबका पेट भी तो भरना है."

खमिता के गांव की और महिलाएं उसकी बात से हामी भरते हुए सर हिला देती हैं. कसलीबेन कहती हैं कि गांव में आंगनवाड़ी का काम भी सुचारू रूप से नहीं चलता इसलिए माता और बच्चे के स्वास्थ्य का ध्यान रखने के लिए आपस में मिलकर ही मदद करनी पड़ती है.

कुपोषण की वजह रूप या भूख?

कांसतिया गांव से क़रीब 10 किलोमीटर दूर कुपोषित बच्चों के लिए एक केंद्र है. इसे सरकार नहीं ग़ैर-सरकारी संस्था आनंदी चलाती है.

यहां अति-कुपोषित बच्चों को दो समय का खाना दिया जाता है. यहां आए सभी बच्चों के पेट फूले हुए दिखते हैं, जो कुपोषण की पहली निशानी है.

दाहोद और पंचमहल में आनंदी संस्था में 17 साल से काम कर रहीं काशिबेन बताती हैं कि यहां सभी परिवार या तो ग़रीबी रेखा के नीचे की श्रेणी में आते हैं या रेखा के ऊपर की, इसलिए पोषण के लिए सरकार पर निर्भरता बहुत ज़्यादा है.

काशिबेन के मुताबिक़, "आंगनवाड़ी में खाना बहुत कम मिलता है इसीलिए हमने अपने कुपोषण को दूर करने के लिए केंद्र बनाए हैं, गांव में जागरूकता बढ़ी है और वहां की महिलाएं सरकारी सुविधाओं से जुड़े अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने लगी हैं."

इस केंद्र में एक डेढ़ महीने की बच्ची है. इसके हाथ, पैर और चेहरा ठीक से विकसित तक नहीं हुआ है. और मां इतनी कमज़ोर है कि अपना दूध भी बच्ची को नहीं पिला सकती.

गुजरात, कुपोषण, आदिवासी महिलाएं

पिछले साल प्रदेश में कुपोषण की समस्या पर सवाल पूछे जाने पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था, "गुजरात में ज़्यादातर शाकाहारी खाना खाया जाता है, और आबादी का एक बड़ा हिस्सा मध्यम वर्ग है, जिसकी लड़कियां सेहत से ज़्यादा, रूप पर ध्यान देती हैं, इसलिए दूध नहीं पीतीं."

कुपोषण और एनीमिया ज़्यादातर गांवों में देखा जाता है, और इन ग्रामीण आदिवासी महिलाओं की सच्चाई इससे कोसों दूर है. वह कहती हैं कि रूप का क्या करें, जब कमरतोड़ मज़दूरी से पेट पालना पड़ता है. और दूध, वह तो उनके नसीब में ही नहीं है.

कसलीबेन के मुताबिक़ आदिवासी इलाक़ों में गर्भवती महिलाओं का हीमोग्लोबिन का स्तर बहुत कम है और कई बार तो तीन तक गिर जाता है. वह कहती हैं, "हम तो एक लीटर दूध झट पी जाएं. गांव में अगर दूध मुहैया करा दिया जाए तो महिलाएं कमज़ोर न रहें और बच्चे भी सेहतमंद पैदा हों."

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