आख़िर यही समय क्यों चुना संजय बारू ने?

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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल में उनके मीडिया सलाहकार रहे पत्रकार संजय बारू की किताब 'दी एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर: मेकिंग एंड अनमेकिंग ऑफ मनमोहन सिंह' विवादों में है.

कुछ लोग इसके प्रकाशन के समय को लेकर सवाल उठा रहे हैं तो कुछ लोग किताब के समर्थन में आ गए हैं.

बारू की इस किताब पर अपनी राय रख रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय और बीबीसी संवददाता ज़ुबैर अहमद.

मधुकर उपाध्याय

कुछ दशक पहले हरियाणा में खुदाई में दो शिलालेख मिले थे. पहला संस्कृत में था. फ़ौरन उसका काल निर्धारण नहीं हो सका. लेकिन उसके एक शब्द पर सबका ध्यान अटका, 'पृष्ठपुरुष'. दूसरा शिलालेख राजा सूरजमल के काल का था. अट्ठारहवीं सदी के जाट राजा के शिलालेख में इसी से मिलता-जुलता एक शब्द था, 'पीठमर्द'.

दोनों शिलालेखों में इन शब्दों को पदनाम बताया गया था, जिनकी बाक़ायदा वेतनभोगी नियुक्ति होती थी.

इस मामले में वो चारण-भाटों से भिन्न माने गए थे क्योंकि उन्हें केवल यशोगान नहीं करना था.

'पीठमर्द' को कठिन या अलोकप्रिय सलाह देने का अधिकार था, जो दरबार के मंत्रियों को भी हासिल नहीं होता था.

उस पद की गरिमा थी और समाज में सम्मान था. चारण भाट राजपाट बदलने पर नए शासक का गुणगान करने लगते थे. लेकिन 'पृष्ठपुरुषों' के बारे में ऐसा कोई उदाहरण उपलब्ध नहीं है, जहाँ उन्होंने सत्ता के साथ पाला बदल लिया हो या सच बोलने से पीछे हट गए हों. भले उन्होंने पद त्याग दिया हो, वे कभी अपने उत्तरदायित्वों से विमुख नहीं हुए.

संजय बारू का कार्टून, रेखांकन- तन्मय त्यागी

एक अच्छा सलाहकार प्रथमत: और अंतत: एक अच्छा सलाहकार होता है. ये भूमिका आसान न कभी थी, न होगी.

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के पहले संस्करण में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे पत्रकार संजय बारू को यक़ीनन एक अच्छा सलाहकार होने का श्रेय मिलना चाहिए.

अपने लेखों और उससे अधिक अपनी ताज़ा किताब' 'दी एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' में बारू ने दृढ़ता से अपनी बात रखी है.

इसकी परवाह किए बिना कि चुनाव के इस दौर में उन्हें आहत पक्षों की आलोचना का शिकार होना पड़ेगा या किसी को इसका राजनीतिक लाभ मिल जाएगा. या उनकी किताब का नाम विकास स्वरूप की 'दी एक्सीडेंटल अप्रेंटिस' से मेल खाता है और यह लेखकीय ग़ैर ईमानदारी का मामला बनता है.

संजय बारू प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार थे, यूपीए या कांग्रेस पार्टी के नहीं. वो अपनी ज़िम्मेदारी समझते थे और उन्होंने यह मुग़ालता कभी नहीं पाला कि उनकी भूमिका प्रधानमंत्री कार्यालय से बाहर भी हो सकती है.

बारू अपनी किताब में कहते हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय वाली भूमिका भी आसान नहीं थी. दरबारों में चलने वाली कतर-ब्योंत, अधिकारों की छीनाझपटी और मुखिया से निकटता सिद्ध करने की होड़ वहाँ थी और ख़ूब थी.

संजय बारू इस सबके बावजदू अविचलित काम करते रहे, जिसका प्रमाण ये किताब है.

प्रधानमंत्री कार्यालय की प्रारंभिक प्रतिक्रियाएं ऐसी थीं कि जैसे संजय बारू ने मनमोहन सिंह की छीछालेदर की हो और उनकी छवि बिगाड़ी हो. पीएमओ ने इसे लफ़्फ़ाज़ी, झूठ का पुलिंदा और कपोल कल्पना क़रार दिया है कि रीढ़विहीन प्रधानमंत्री हैं जिन्हें हर बात के लिए कांग्रेस और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी का मुँह देखना पड़ता है.

दरअसल 'दी एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' साबित करती है कि विपक्ष की आलोचनाएं निराधार नहीं थीं, मसलन सोनिया गांधी के साथ मनमोहन सिंह के समीकरण ने सत्ता को लुंज-पुंज बना दिया.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, भाजपा नेता सुषमा स्वराज और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी

प्रधानमंत्री ने अपनी और अपने पद की गरिमा गिरवी रख दी. उन्होंने बिना विरोध सोनिया गांधी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया, क्योंकि उनके हाथ बंधे हुए थे.

ये किताब विपक्ष के सभी आरोपों को तथ्यपरक मानते हुए एक तरह से उनकी पुष्टि करती है. लेकिन क़रीब-क़रीब हर दूसरे-तीसरे पन्ने पर मनमोहन सिंह का बचाव करते हुए, इसका ज़्यादातर दोष 10 जनपथ(सोनिया का निवास) और उसके सलाहकारों पर मढ़ती है.

संजय बारू ने अपनी किताब और उस पर बाद में दिए गए साक्षात्कारों में स्वीकार किया है कि उनकी किताब मनमोहन सिंह का 'मानवीकरण' करती है. वरना नई पीढ़ी तो उन्हें नख-दंत विहीन रोबोट या पत्थर की मूरत ही मान बैठती.

बारू को यह बात अफ़सोसनाक और बुरी लगती है कि प्रधानमंत्री का मज़ाक़ उड़ाया जा रहा है और उनका कोई प्रशंसक नहीं बचा है.

बारू ने कहा, "मैं उन्हें मानवीय रूप में पेश कर रहा हूं और किताब का 90 फ़ीसदी हिस्सा मनमोहन सिंह की तारीफ़ में है. मैंने यह किताब इसलिए लिखी है कि मनमोहन सिंह को उनके काम का श्रेय नहीं दिया जा रहा था. मुझे लगा कि उनका ठीक से बचाव नहीं हो रहा है."

एक लेखक और पाठक होने के नाते मुझे क़तई नहीं लगता कि राजनीतिक फ़ायदे के लिए यह किताब लिखी गई है या इसका समय चुना गया है क्योंकि मैं लेखकीय अधिकार का पक्षधर हूं.

मैं यह मानता हूं कि किसी भी लेखक को कोई भी किताब लिखने और प्रकाशित करने का अधिकार है. उसको इस बात का भी अधिकार है कि वह अपनी किताब किस कालखंड को चुनकर उस पर लिखे. वह कहां रुकता है (यह किताब यूपीए-एक पर ख़त्म हो जाती है, यूपीए-दो तक नहीं आती), यह बातें बेकार हैं, बेमानी है.

किसी भी लेखक से आप उसका यह अधिकार नहीं छीन सकते कि वह अपनी किताब कब लिखे और कब प्रकाशित कराए. ज़ाहिर है, कोई लेखक इसलिए किताब प्रकाशित नहीं करेगा कि उसे पढ़ा न जाए, उस पर चर्चा न हो. कम से कम इतना अधिकार तो लेखक को होना ही चाहिए.

बकौल संजय बारू, उनकी किताब में वो सबकुछ शामिल नहीं है, जो वो जानते हैं. उस सच का केवल आधा हिस्सा किताब में है. यानी कि हमें दूसरे आधे हिस्से की प्रतीक्षा करनी है.

तब शायद 'दी एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' पीसी एलकजेंडर की 'थ्रू दी कॉरीडोर्स ऑफ पॉवर' और नटवर सिंह की 'वॉकिंग विद लायंस' जैसी किताबों की श्रेणी में आ सकेगी.

एमओ मथाई की किताब 'रेमिनिसेंसेज़ ऑफ दी नेहरू एज' के बरक्स खड़ा होने में किसी भी किताब को लंबा व़क्त लग सकता है.

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ज़ुबैर अहमद

मनमोहन सिंह

2004 से 2009 के बीच प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू की किताब ने आम चुनावों के बीच में भले ही तूफ़ान न ला दिया हो लेकिन हलचल ज़रूर पैदा कर दी है.

प्रधानमंत्री की सबसे बड़ी पुत्री उपिंदर सिंह ने इसमें लिखी गईं बातों और इसके रिलीज़ होने के समय पर ज़रूर सवाल किया है.

तर्क देते-देते उन्होंने यहां तक दावा किया यह किताब अफ़वाहों और ग़ैर सत्यापित उद्धरणों से भरी हुई है.

जब संजय बारू एक पत्रकार हुआ करते थे तो उनकी प्रतिष्ठा न डिगने वाले एक ईमानदार व्यक्ति के रूप में थी.

पत्रकारिता के अपने शुरुआती दिनों में बारू और मैं एक ही मीडिया संस्थान में काम करते थे. नए रिपोर्टर के रूप में मुझे उनकी सलाहों की ज़रूरत पड़ती थी.

इसलिए पुस्तक की सामग्री को लेकर बारू पर सवाल खड़ा करना उनके प्रति नाइंसाफी होगी. यह बात प्रधानमंत्री की तरफ़ से आनी चाहिए.

किसी भी तरह से सामग्री के लिहाज़ से पुस्तक में कोई बड़ा ख़ुलासा नहीं है.

पुस्तक की मुख्य बात है- संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा प्रधानमंत्री के कामकाज में हस्तक्षेप किया जाना और प्रधानमंत्री का दृढ़ता दिखाने में असमर्थ होना.

लेकिन यह बात पहले से ही लोगों में चर्चा का विषय रही है, जहां तथ्य और कल्पना आपस में बहुत गुंथे हुए थे.

इसलिए, ऐसे समय में जब मनमोहन सिंह तीसरी बार पद संभालने की संभावनाओं से इनकार कर चुके हैं, यह जरूरी नहीं कि पुस्तक की सामग्री उनकी प्रतिष्ठा को और अधिक क्षति पहुंचाए ही.

हालांकि, हो सकता है कि इससे सोनिया गांधी और कांग्रेस पार्टी को ठेस पहुंचे.

लेकिन इसके समय को लेकर सवाल खड़ा होता है. ऐसा लगता है कि यह किताब केवल एक पक्ष को ही लाभ पहुंचाने जा रही है और वो है भाजपा.

यह तथाकथित मोदी लहर में और घी डालेगी.

एक प्रतिष्ठित पत्रकार के रूप में और खासकर प्रधानमंत्री के पूर्व मीडिया सलाहकार के रूप में बारू निश्चित रूप से यह अच्छी तरह जानते थे कि यह किताब क्या प्रभाव पैदा करेगी. निष्पक्षता की मांग थी कि लेखक को किताब के प्रकाशन के लिए चुनाव के पूरी तरह सम्पन्न होने तक इंतजार करना चाहिए था.

यह पूरी तरह स्पष्ट है कि यह पुस्तक किसके हित में है और किसके विरोध में.

इस किताब ने नरेंद्र मोदी के हाथ में सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ उनकी और उनकी पार्टी की छवि को धूमिल करने वाला एक और हथियार थमा दिया है.

मनमोहन सिंह

कुछ लोग तर्क देते हैं कि बारू को अधिकार है कि वो जब और जैसे चाहें पुस्तक प्रकाशित कराएं.

और यदि उन्होंने चुनाव के बीच इसे प्रकाशित करने का विकल्प चुना ताकि इसकी बिक्री बढ़ सके तो इसमें ग़लत क्या है?

लेकिन, गोपनीय फाइलों और महत्वपूर्ण बैठकों तक यदि बारू की पहुंच थी और वो प्रधानमंत्री के विश्वसनीय सहयोगी के थे तो यह अनैतिक है और विश्वासघात है.

पुस्तक के प्रकाशन के समय के बारे में ये दो ही शब्द हैं जो प्रधानमंत्री की बेटी ने इस्तेमाल किया. क्या इससे भी ज़्यादा कुछ हो सकता है?

जब 2009 में मनमोहन सिंह दोबारा प्रधानमंत्री चुने गए तो बारू को इस पद पर दोबारा नियुक्त नहीं किया गया. यह किताब उन पांच वर्षों का वृतांत है. इसमें अगले पांच सालों का जिक्र नहीं है.

यदि यह किताब उसके कुछ साल बाद ही आ गई होती जब बारू की दोबारा नियुक्ति नहीं हुई तो कोई भी इसके समय को लेकर सवाल नहीं करता.

लेखक की मंशा भी स्पष्ट नहीं है. वे लोग, जो पहले ही कमज़ोर प्रधानमंत्री की धारणा बनाए हुए हैं, कहते हैं कि वो मनमोहन सिंह के लिए कुछ अच्छा कहना चाहते थे.

लेकिन, लगता है कि इन 'अच्छी बातों' से प्रधानमंत्री कार्यालय और उनका परिवार परेशान हो गया है.

बाकी लोग पहले ही इसके समय को लेकर शोरगुल मचा चुके हैं.

केवलर बारू ही अपनी मंशा को जानते हैं, लेकिन जाने-अनजाने उनकी किताब एक ऐसे समय में आई है जिसे 'कुसमय' ही कहा जा सकता है.

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