जब फिल्म वालों ने बनाई थी अपनी सियासी पार्टी..

देव आनंद
    • Author, राजकुमार केसवानी
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए विशेष
  • प्रकाशित

एक चुनावी सवाल– आज से 35 साल पहले किस पार्टी ने अपने घोषणापत्र में ये कहा था, “आप सब लोग ही देश हैं. यह आपकी पार्टी है और आप ही के लिए है. हम कोई जादू नहीं कर सकते. हम सिर्फ़ सही समय पर, सही नतीजे आपके सामने लाकर दिखाएंगे. यह आपका अधिकार है कि आप ऐसी सरकार को चुनें जो आप चाहते हैं. सोचिए, समझिए और अपना वोट अपने और देश के हित में कीजिए.”

नहीं याद आया? ऐसा ही होता है. हर चुनाव के बाद हम लोग अकसर पुरानी बातों को भूलकर नई बातों में उलझ जाते हैं.

दरअसल ये ऊपर कही गई बातें किसी आम राजनीतिक पार्टी ने नहीं, बल्कि फिल्म वालों की पॉलिटिकल पार्टी ने कही थीं, जिसके अध्यक्ष थे सदाबहार अभिनेता देवानंद. और पार्टी का नाम था ‘नेशनल पार्टी’.

इस पार्टी के जन्म और मृत्यु की कहानी बड़ी दिलचस्प है.

जनता पार्टी से भी निराशा

असल में एक लम्बे अरसे तक अधिकांश फिल्म वालों का रुझान या तो कांग्रेस या फिर कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ ही था. पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई के 50 और 60 के दशक के कई बड़े फिल्मकारों और फिल्म कलाकारों से क़रीबी रिश्ते थे. इसी के चलते यह फ़िल्मी जमात अकसर कांग्रेस उम्मीदवारों के चुनाव अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थी.

यह रिश्ता लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी के शुरुआती दौर तक तो बहुत ठीक-ठाक ही बना रहा लेकिन 1975 के आपातकाल के दौरान इन रिश्तों में एक गहरी दरार आ गई.

इस दौर में सरकार ने फिल्म जगत पर जिस तरह की सख़्तियां दिखाईं, उससे सिनेमाई दुनिया पूरी तरह से हिल गई थी. फिर बात चाहे सेंसर की हो या फिर सरकार के हुकम पर चाहे-अनचाहे नाचने-गाने की मजबूरी.

नेशनल पार्टी का संविधआन
इमेज कैप्शन, नेशनल पार्टी का कार्यालय वी शांताराम के परेल स्टूडियो में बना लेकिन काम मुख्यतः देवानंद के कार्यालय से ही होता था.

किशोर कुमार जैसे फ़नकार ने जब इस तरह के जबरिया हुकम को मानने से इंकार किया तो उन पर इनकम टेक्स वालों ने नज़रें टेढ़ी कर लीं और रेडियो पर उनकी आवाज़ तक पर पाबंदी लग गई.

1977 में जब आपातकाल के बाद चुनाव आए तो फिल्म उद्योग ने कांग्रेस से बदला लेने की गरज़ से एकजुट होकर चुनाव में ‘कुछ’ करने और कांग्रेस को सबक सिखाने का इरादा कर लिया. इस मौके पर जनता पार्टी के कुछ नेताओं, ख़ासकर राम जेठमलानी ने फिल्म वालों को उनकी पार्टी की मदद करने के लिए तैयार कर लिया.

इस चुनाव में अनेक फिल्म कलाकारों ने जनता पार्टी के उम्मीदवारों का प्रचार किया और जीतने में मदद की. जब जनता पार्टी की सरकार बन गई तो उससे फिल्म इंडस्ट्री की अपेक्षाएं भी बहुत बढ़ गईं. ख़ासकर फिल्म निर्माण में काम आने वाले रॉ स्टाक और रिलीज़ प्रिंट्स पर लागू भारी-भरकम लेवी में कटौती और दीगर कानूनों में ज़रूरी फेर-बदल.

इस बार भी फिल्म जगत के हाथ किसी नतीजे की जगह निराशा ही आनी थी.

1979 में जब जनता सरकार का पतन हुआ और नए चुनाव का एलान हुआ तो इस बार फिल्म वालों ने पूरी गंभीरता से 1977 वाले अपने संकल्प को पूरा करने की मुहिम शुरू कर दी. यह संकल्प था एक राजनीतिक दल का गठन.

घोषणापत्र

देवानंद ने आगे बढ़कर इस मुहिम का आग़ाज़ किया और साथ में उनके छोटे भाई विजय आनंद के अलावा निर्माता-निर्देशक वी.शांताराम, ‘शोले’ वाले– जीपी सिप्पी, श्री राम बोहरा, आईएस जोहर, रामानंद सागर, आत्माराम और साथ में शत्रुघन सिन्हा, धर्मेंद्र, हेमामालिनी, संजीव कुमार जैसे अनेक सितारे भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ गए. इन तमाम लोगों ने एकमत से देव साहब को इस नवगठित पार्टी का अध्यक्ष चुन लिया.

देवानंद को शीर्ष पर बिठाने के पीछे की कथा यह है कि वे सबसे ज़्यादा निडर होकर कांग्रेस और जनता पार्टी के बड़े नेताओं के दोहरे चरित्र पर खुलकर हमले कर रहे थे और हर अंजाम के लिए तैयार थे.

उनके साथ के दूसरे लोग इस हक़ीक़त से वाकिफ़ थे कि धंधा करते हुए सरकार से पंगा लेना ख़तरनाक हो सकता है, लिहाज़ा देवानंद इस पार्टी का चेहरा और मुखर आवाज़ की तरह दुनिया के सामने आए.

14 सितम्बर 1979 को बम्बई के ताजमहल होटल में हुई एक प्रेस कांफ्रेंस में ‘नेशनल पार्टी’ के गठन की घोषणा की गई. इसी के साथ एक पार्टी का घोषणापत्र भी जारी किया गया. 16 पेज के घोषणा पत्र में नेशनल पार्टी को जनता के लिए ‘थर्ड आल्टर्नेटिव’ के तौर पर पेश करते हुए कहा गया था –

"इंदिरा की तानाशाही से त्रस्त लोगों ने जनता पार्टी को चुना, लेकिन निराशा ही हाथ लगी. अब यह दल भी टूट चुका है. अब ज़रूरत है एक स्थायी सरकार दे सकने वाली पार्टी की. नेशनल पार्टी के गठन के पीछे विचार है देश के लोगों को थर्ड आल्टर्नेटिव देने का."

"पेशेवर राजनीतिज्ञों ने आम आदमी की रोज़मर्रा की मुश्किलों पर एक अर्से से आंखें मूंद रखी हैं. नेशनल पार्टी वह मंच है जहां समाज के अलग-अलग हल्कों में काम करते हुए समान विचार वाले तमाम लोग एक साथ आ सकते हैं. इनमें लेखक, विचारक, बुद्धिजीवी, व्यापारी, मज़दूर, किसान, महिलाएं और नौजवान शामिल हैं."

इस लंबे-चौड़े घोषणापत्र को पढ़ते हुए यूं मालूम होता था, मानो समाजवाद और पूंजीवाद के मिलन समारोह की भूमिका लिखी गई हो. ज़ाहिर है फिल्मी दुनिया के नेताओं को भी इस बात का पूरा अंदाज़ा था कि बिना आम आदमी को अपने साथ जोड़े कोई बात नहीं बनेगी.

आईएस जोहर की चुनौती

इस पार्टी के गठन की घोषणा के साथ ही इसका मुख्यालय वी.शाताराम के परेल स्थित राजकमल स्टूडियो में स्थापित हो गया, हालांकि इसका सक्रिय संचालन देवानंद के दफ़्तर से ही मुख्य रूप से होता था. देश भर में सदस्यता अभियान भी शुरू हो गया.

'फिल्म वालों की पार्टी में सबका स्वागत है' वाली बात ने देश भर के नौजवान तबके को बेहद आकर्षित किया. तीसरे विकल्प को तलाशते बुद्धिजीवी वर्ग में दो धाराएं बन रही थीं. एक वर्ग का यह विचार था कि सितारों के ग्लैमर और उनके धन की ताकत का इस्तेमाल करके व्यवस्था को बदला जा सकता है लेकिन दूसरा वर्ग इसे महज़ फिल्मी तमाशा मान रहा था.

नेशनल पार्टी का सदस्यता अभियान
इमेज कैप्शन, नेशनल पार्टी ने कांग्रेस और जनता पार्टी की नींद उड़ा दी थी.

दूसरी तरफ़ जनता सरकार और कांग्रेस काफ़ी चिंतित थे. मुम्बई के शिवाजी पार्क में नेशनल पार्टी की रैली में उमड़ी भीड़ ने इस चिंता को और बड़ा दिया. नेशनल पार्टी में लगातार फिल्मी और ग़ैर-फिल्मी हस्तियों को चुनाव मैदान में उतारने और बड़े नेताओं को धूल चटाने की योजनाओं पर गहन चिंतन होने लगा था. प्रसिद्ध अभिनेता अईएस जोहर ने तो बाकायदा घोषणा ही कर दी थी कि वे जनता सरकार में स्वास्थ्य मंत्री राज नारायण के ख़िलाफ चुनाव लड़ेंगे और उन्हें बुरी तरह हराएंगे.

जोहर के ऊट-पटांग बयानों से चिढ़कर अपनी पहलवानी का बखान करते हुए राज नारायण ने यहां तक कह दिया था कि अगर जोहर अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आया तो मैं उसके हाथ-पैर तोड़ दूंगा.

जोहर भी कम नहीं थे. उन्होंने अंगेज़ी पत्रिका ‘डेबोनियर’ को एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि "मैं नेशनल पार्टी का राज नारायण हूं और कोई मुझे चुप नहीं करा सकता. मैं तो उस राज नारायण को अपने ढोल की तरह इस्तेमाल करा रहा हूं और करता रहूंगा."

बाकी सब तो ठीक ही चल रहा था लेकिन जनता सरकार और कांग्रेस के बड़े नेताओं ने जी.पी. सिप्पी और रामानंद सागर जैसे असरदार फिल्म वालों को नसीहत दी कि चुनाव के बाद होने वाली मुश्किल से फिल्म उद्योग को बचाना है तो इस ‘तमाशे’ को बंद कर दें.

धीरे-धीरे नेशनल पार्टी में सक्रिय फिल्मकार और फिल्म कलाकार किनारा करने लगे और देवानंद लगभग अकेले ही रह गए. ऐसे में उन्होंने नेशनल पार्टी के विचार को ख़ामोशी से दफ़न कर दिया.

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi " platform="highweb"/></link>. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi " platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi " platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>