सर चढ़के बोलता है कटरीना-आदित्य का 'फ़ितूर'

फ़ितूर
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बेशक, ज़्यादातर क्लासिक रोमांटिक फ़िल्मों के केंद्र में वर्ग भेद होता है. अमीर लड़का, ग़रीब लड़की (या ग़रीब लड़का, अमीर लड़की) वाली कहानी तो हमेशा से अपनी देसी बॉलीवुड फ़िल्मों की रोज़ी रोटी रही है.

लेकिन अब उन पर लिखना या फ़िल्म बनाना मुश्किल क्यों होता जा रहा है? मुझे लगता है, ज़्यादातर समझदार लोग(जिन्हें मैं जानता हूं) अंतरंगता के मुद्दे से पीड़ित दिखाई देते हैं यहां तक कि प्रेम के सवाल पर भी.

इसके अलावा, मेरा मानना है कि अपनी जड़ों से पूरी तरह जुदा बड़े शहरों में, जहां स्त्री और पुरुष दोनों आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं, वर्ग भेद लगातार अहमियत खोता जा रहा है.

अगर आप किसी से प्यार करते हैं, तो आप प्यार करते हैं. उसमें समस्या क्या है.

फ़ितूर

फ़ितूर (जिसे किसी शख़्स या चीज़ के लिए जुनून के तौर पर भी समझा जा सकता है) चार्ल्स डिकंस के कालजयी उपन्यास 'ग्रेट एक्सपेक्टेशन' पर आधारित है.

फ़िल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि है, उसका स्क्रीनप्ले जिसे लिखा है सुप्रतीक सेन ने.

क्योंकि हम कहानी तो जानते ही हैं, और ये कहानी डेढ़ सौ साल पुरानी है, लेकिन लुटियन्स की दिल्ली में वर्गभेद के लिए संवेदनशील समाज और कश्मीर की पृष्ठभूमि में बुनी गई ये कहानी फिर भी क़ाबिले तारीफ़ है.

मेरा मतलब ये नहीं कि ये असल लगती है. असलियत तो उबाऊ हो सकती है.

मेरा मतलब है, ये इतनी असल लगती है कि आप इस अनुभव के दौरान इसकी असलियत पर ज्यादा सवाल ना उठा पाएं. और फ़िल्मनिर्माता आपको तेज़ी से उस अतिनाटकीयता से दूर ले जाते हैं जो ऐसी फ़िल्म को बरबाद कर सकता है.

जब अतिनाटकीयता हमारे रास्ते से हटा दी जाती है तो हम इस तरह की फ़िल्मों के प्रति अलग तरीके से प्रतिक्रिया करते हैं.

फ़ितूर

आसान शब्दों में कहा जाए तो, या तो ये आपको अपील करता है, या नहीं. इसकी कोई वजह नहीं है.

ये जज़्बात की बात है. एक हद के बाद किसी भी चीज़ को शब्द देने या बुद्धिसंगत करने की कोशिश में आप बेवकूफ़ नज़र आने लगते हैं.

इस फ़िल्म की शुरुआत में, जब एक ग़रीब लड़का बड़ी जायदाद की उत्तराधिकारी लड़की (कटरीना क़ैफ़ का सटीक बाल संस्करण) से प्यार करने लगता है, तो पृष्ठभूमि में जो गीत बजता है, वो इस साल का बेहतरीन गीत हैः 'ऐसे कैसे'. फ़िल्म का टाइटल ट्रैक भी उम्दा है. मैं कहता, बहुत 'रहमान' जैसा.

फ़ितूर

लेकिन अब अमित त्रिवेदी की उनके मौलिक संगीत के लिए तारफ़ करनी ही चाहिए. पूरी फ़िल्म का संगीत कोमल सुरों और मौन के लंबे गलियारों का बारीक़ मिश्रण है.

चुप्पी के ऐसे पल, जिनमें पर्दे पर सिर्फ संवाद गूंजते हैं. ये एक बहुत आत्मविश्वासी निर्देशक (अभिषेक कपूर) के लक्षण हैं.

ज़्यादातर निर्देशक हॉल में चुप्पी से डरते हैं. उनका मानना है कि दर्शक इसकी ये कह कर शिकायत करेंगे कि "फ़िल्म बहुत धीमी है." और हो सकता है कि वो ये शिकायत करें. लेकिन हर फ़िल्म एक म्यूज़िक वीडियो नहीं हो सकती.

और अगर पृथ्वी पर कहीं स्वर्ग है तो उसे ढूंढने, तैयार करने और सही जगह कैमरा लगा कर उसे शूट करने में फ़िल्म निर्माताओं ने बहुत मेहनत की है.

फ़िल्म के दृश्य अद्भुत हैं. छोटा ग़रीब बच्चा बड़ा होकर शिल्पकार/चित्रकार बनता है. इससे ही घर के भीतर के दृश्यों की कलात्मक पृष्ठभूमि का मूड तैयार हो जाता है.

फ़ितूर

एक रहस्यमय सरपरस्त इस चित्रकार को जल्द ही कला के क्षेत्र में स्थापित कर देता है. चित्रकार का मानना है कि ये गुप्त सहायक उसके बचपन की प्रेमिका की मां (तब्बू) है. (अब तो ये कहना चलन में आ गया है कि तब्बू पर्दे पर असाधारण लगती हैं. लेकिन हर चलन की तरह ये भी सच है).

वो अपनी बेटी को लंदन भेज देती है. जो कटरीना के हिंदी संवाद बोलने के एक वैश्विक लहजे की न्यायसंगत वजह भी बन जाती है.

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आदित्य रॉय कपूर अपने आप में गुम, मौन और संवेदनशील लगने वाले प्रेमी की भूमिका में हैं. ऐसे किरदार उन्होंने पहले भी निभाए हैं. लेकिन वो ऐसी भूमिकाओं में इतने फिट बैठते हैं कि उन्हें इस भूमिका में चुनने के लिए फ़िल्मनिर्माताओं को दोष नहीं दिया जा सकता.

ये विचारमग्न किरदार इतना असरदार है कि फ़िल्म के दौरान और उसके बाद भी मैंने खुद को भी वही मुखाकृति लिए पाया. आप उसके दिल के टूटने को समझ सकते हैं और कभी कभी तो महसूस भी कर सकते हैं

ये फ़िल्म दो बेहद खूबसूरत लोगों की मौजूदगी का उत्सव है और इस दौरान नायिका नायक को अपनी नाज़ुक निगाहों, छोटी-छोटी बातों से धीरे धीरे घायल करती जाती है.

नायक उससे प्रेम करने लगता है और बार बार किसी मरहम की उम्मीद से परे खुद को आहत करता है

फ़ितूर
इमेज कैप्शन, फिल्म के निर्देशक अभिषेक कपूर

सो दर्द से तड़पता देसी चित्रकार है, उसकी एक बेहद खूबसूरत प्रेरणा है जो उसके प्रेम के अनुकूल कोई इज़हार नहीं कर सकती, और इसके साथ सुंदर संगीत और बर्फ से ढके पर्वतों का एक चित्र जैसा नज़ारा है...आप बेशक इम्तियाज़ अली की फ़िल्म 'रॉकस्टार' के बारे में सोचेंगे. हालांकि उस फ़िल्म में (जो एक और क्लासिक प्रेमकहानी-हीर रांझा पर आधारित थी) अधिक ऊर्जा थी.

ये एक अंग्रेज़ी साहित्यिक कृति का कुशल रूपांतरण ज़्यादा है. बॉलीवुड के संदर्भ में ये फ़िल्म विशाल भारद्वाज के 'मेकबेथ'(शेक्सपियर का नाटक) के हिंदी संस्करण 'मक़बूल'(2004) से अधिक प्रेरित दिखती है.

मुझे अब भी याद है कि 'मक़बूल' के देर रात के शो के बाद घर लौट कर मैं सीधे इंटरनेट की शरण में गया था, ये देखने के लिए कि कौन सा किरदार नाटक के किस चरित्र पर आधारित था और उन्होंने 17वीं सदी के एक नाटक को कैसे समकालीन भारतीय पृष्ठभूमि में रूपांतरित किया था.

तो क्या अब मैं 'ग्रेट एक्स्पेक्टेशन' पर क्लिफ्ट के नोट्स पढ़ने जा रहा हूं?( शायद नहीं, किताबों की सूची अब शायद पहले जैसी नहीं रही) लेकिन जो भी हो, फ़िल्म बेशक कामयाब रही है.

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