'रोर' में कितना दम: मयंक शेखर का रिव्यू

रोर- द टाइगर्स ऑफ़ सुंदरबन
    • Author, मयंक शेखर
    • पदनाम, फिल्म समीक्षक
  • प्रकाशित

रेटिंग: *

लगता है ये फ़िल्म ब्रेन डेड लोगों के लिए बनाई गई है.

कहानी है सुंदरबन के एक रॉयल बंगाल टाइगर के बारे में.

एक वन्य जीव फ़ोटोग्राफ़र, बाघ के बच्चों को जंगल से दूर अपने घर ले जाता है.

जिससे नाराज़ होकर वो बाघ इस फ़ोटोग्राफ़र को मार डालता है.

अजीब किरदार

रोर- द टाइगर्स ऑफ़ सुंदरबन

इस फ़ोटोग्राफ़र का भाई एक कमांडो है.

वो उस बाघ से बदला लेने के लिए अपने साथ दूसरे कुछ लड़ाकों को लेकर (जो शायद सेना से हैं) जंगल में आता है.

उसकी टीम में एक लड़ाकू राजकुमारी ज़ेना भी है जो एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर लटकती रहती है.

एक वज़नदार टार्ज़न है.

जंगल में इनका मार्गदर्शन करने वाली एक हॉट गाइड है.

बेतुका स्क्रीनप्ले

रोर- द टाइगर्स ऑफ़ सुंदरबन

ये सारी फ़ौज एक बोट पर सवार होकर उस बाघ की खोज में निकलती है.

बोट से हथियार उतारती और चढ़ाती रहती है और टीम के सदस्य एक दूसरे से महज़ बकवास करते रहते हैं.

जब भी ये किसी बाघ को देखते हैं तो बिल्कुल क़रीब से अंधाधुंध गोलियां चलाते हैं लेकिन मज़ाल कि एक गोली बाघ को छू तक जाए.

रोर- द टाइगर्स ऑफ़ सुंदरबन

अगर किसी देश की सेना में ऐसे निशाने वाले जवान हों तो भगवान बचाए उस देश को.

मैं 'सेव द टाइगर मिशन' का बहुत बड़ा समर्थक हूँ.

लेकिन जब ऐसी फ़िल्म आपके सामने परोसी जाए तो टाइगर से पहले अपने आपको बचाएं.

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