जेन ज़ी और विपक्ष के आंदोलन: भारत में विरोध की भाषा इतनी तेज़ी से क्यों बदली?

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
दिल्ली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और मुंबई में कॉकरोच जनता पार्टी के नेता अभिजीत दीपके और शिवसेना (यूबीटी) के नेता उद्धव ठाकरे विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.
इस समय एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर देश के तमाम हिस्सों में विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं. जिनमें बड़ी संख्या में जेन ज़ी शामिल हैं.
इससे पहले नीट पेपर लीक को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया था और जुलाई में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा था.
पिछले कई दशकों में शायद ही कभी किसी आंदोलन की भाषा इतने कम समय में इतनी तेज़ी से बदली हो, जितनी बीते कुछ महीनों में बदली है.
भारत ने कई बड़े आंदोलन देखे हैं. इनमें से कई आंदोलनों का असर समाज के हर वर्ग पर पड़ा. मगर क्या इस बार कुछ अलग है?
अभिजीत दीपके की टिप्पणी से राजनीतिक टिप्पणीकार भी हैरान

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ऐसा ही एक आंदोलन उस समय हुआ था, जब दिल्ली में चलती बस में एक युवती के साथ बलात्कार के विरोध में बड़ी संख्या में युवा लड़के और लड़कियां सड़कों पर उतरे थे. इसके बाद दशकों पुराने बलात्कार क़ानूनों में पहली बार बड़े बदलाव किए गए थे.
इसी तरह गांधीवादी नेता के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ भी एक बड़ा आंदोलन हुआ था.
लेकिन पिछले 12 साल में पहली बार, बीते तीन-चार महीनों के दौरान सार्वजनिक मंचों से ऐसी बातें कही गई हैं, जिन्हें बोलने की हिम्मत विपक्ष के सबसे बड़े नेता भी नहीं करते थे.
ये बातें जंतर-मंतर या दूसरी जगहों पर मौजूद आम युवा कह रहे हैं. अभिजीत दीपके जैसे नेता भी ऐसी बातें कर रहे हैं, जो कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी शुरू करके अचानक चर्चा में आ गए हैं.
पिछले हफ़्ते मुंबई के शिवाजी पार्क में एक जनसभा को संबोधित करते हुए दीपके ने कुछ ऐसा कहा, जिसे सुनकर अनुभवी राजनीतिक टिप्पणीकार भी हैरान रह गए.
उन्होंने कहा, "मैं एक ग़रीब माँ का बेटा हूं. तेरी वजह से सारे बच्चे ग़रीब मां के बेटे हो गए."
इसके बाद उन्होंने एक और टिप्पणी की, जो सीधे भारत के सबसे ताक़तवर गृह मंत्री अमित शाह को लेकर थी.
दीपके ने अमित शाह को चुनौती दी कि वह उन्हें गिरफ़्तार करवाकर देखें. उन्होंने कहा कि शाह का भी वही अंजाम होगा, जो धर्मेंद्र प्रधान का हुआ.
देश में क्या हो रहा है?
अनुभवी राजनीतिक टिप्पणीकार संजीव श्रीवास्तव ने बीबीसी न्यूज़ हिंदी से कहा, "देश का युवा जोश अब करवट बदल रहा है. अब वह पहले जैसे हालात बने रहने या हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहने से संतुष्ट नहीं है."
"हमें लगता था कि भारत एक ऐसा समाज है, जो मौजूदा हालात में बदलाव नहीं चाहता. लेकिन पिछले कुछ महीनों से यह परंपरा टूट रही है."
पहले के आंदोलनों से इस बार क्या अलग है?

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पिछले 12 साल में हुए सभी आंदोलन मोटे तौर पर कुछ ख़ास समुदायों तक सीमित रहे. इनमें तीन कृषि क़ानूनों को वापस लेने की मांग को लेकर हुआ किसानों का आंदोलन भी शामिल था.
किसानों को डर था कि सरकार उनकी उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी नहीं देगी. इससे वे अंतरराष्ट्रीय कंपनियों और निजी कारोबारियों के भरोसे रह जाएंगे.
नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ हुआ आंदोलन भी एक समुदाय तक सीमित था. यह आंदोलन पूरे देश में फैला था और इसमें 76 लोगों की मौत हुई थी.
यह किसानों के आंदोलन की तरह क़रीब एक साल तक नहीं चला. फिर भी यह आंदोलन चार महीने तक जारी रहा. कोविड आने के बाद आंदोलन कर रही महिलाएं अपने घरों को लौट गईं.
अनुभवी राजनीतिक टिप्पणीकार आरती जेरथ ने बीबीसी न्यूज़ हिंदी से कहा कि आज जो अंतर दिखाई दे रहा है, वह इससे भी आगे की बात है.
उन्होंने कहा, "आज सड़कों पर उतरने वाले लोग बीजेपी के मतदाताओं के बच्चे हैं. मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग के इनके माता-पिता ने बीजेपी को वोट दिया था. इस वर्ग में महिलाओं का बहुत बड़ा वोट भी शामिल था. ये महिलाएं ख़ास तौर पर नरेंद्र मोदी के समर्थन का आधार बनी थीं."
उन्होंने कहा, "इन आंदोलनों में जितनी बड़ी संख्या में महिलाएं बाहर निकलीं, उससे सरकार पूरी तरह हिल गई."
"सरकार दूसरे आंदोलनों को संभालने में कामयाब रही थी. लेकिन अब यही लोग शिक्षा, नौकरी और बेरोज़गारी जैसे बुनियादी मुद्दों पर उसके ख़िलाफ़ हो गए हैं."
"ये ऐसे मुद्दे हैं, जिनका असर देशभर में आम लोगों पर पड़ता है. इनका असर हर लिंग और हर जाति के लोगों पर होता है."

राजनीतिक और आर्थिक मामलों के एक और अनुभवी टिप्पणीकार माधवन नारायणन कुछ हद तक आरती जेरथ से सहमत हैं.
लेकिन उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिंदी से कहा, "पूरी राजनीतिक बातचीत में धीरे-धीरे खुलकर बोलने की हिम्मत बढ़ रही है. इसकी एक वजह यह है कि तकनीकी रूप से देश में एनडीए की सरकार है, सिर्फ़ बीजेपी की नहीं."
"इसलिए राजनीतिक वर्गों में सत्ता विरोधी माहौल को लेकर एक तरह की उम्मीद दिखाई दे रही है."
उन्होंने कहा, "लेकिन इसी माहौल के बीच हमने देखा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने जब 'कॉकरोच' शब्द का इस्तेमाल किया, तो इससे राजनीतिक बातचीत का स्तर और नीचे चला गया."
"उन्होंने जेन ज़ी की दुखती रग पर हाथ रख दिया. इसी दौरान नीट परीक्षा में पेपर लीक का मुद्दा भी सामने आया. इन दोनों बातों ने दो संवेदनशील मुद्दों को छू लिया."
उन्होंने कहा, "पहली बात यह है कि आप एक ख़ास तरह की सक्रियता को लोकतांत्रिक गतिविधि मानने के बजाय परजीवी गतिविधि बता रहे हैं."
"इसके अलावा युवाओं और निम्न मध्यम वर्ग में सचमुच चिंता है. राजनीति उस समय हमेशा तेज़ मोड़ लेती है, जब निम्न मध्यम वर्ग नाराज़ होता है. इस नाराज़गी को अभिजीत दीपके के रूप में एक चेहरा मिल गया."
नारायणन के मुताबिक़, इन सबके अलावा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर ने भी बुनियादी सवाल खड़े किए.
उन्होंने कहा कि 13 करोड़ मतदाताओं से मतदान का अधिकार छिनने के बाद यह सवाल उठा और इसे मौलिक अधिकारों से जोड़ा गया.
उन्होंने कहा, "इससे इस आंदोलन को समाज में स्वीकार्यता मिल रही है. इसका नतीजा यह हुआ है कि भाषा ज़्यादा बेबाक हो गई है. यह बदलाव मांगों और उनके लिए इस्तेमाल की जा रही भाषा, दोनों में दिखाई देता है."
सरकार की प्रतिक्रिया और अनिश्चितता
बदलते हालात से निपटने के लिए सरकार के पास कोई पहले से तैयार तरीक़ा या असरदार जवाब नहीं है.
पिछले 10 से 12 साल में अपनाए गए तरीक़े अब उतने असरदार साबित नहीं हो रहे हैं. कई बार इनका उलटा असर भी हो सकता है. इसके उदाहरण के तौर पर दिल्ली के जंतर-मंतर का ज़िक्र किया गया है.
क्या ऐसे आंदोलन देश की राजनीति बदल सकते हैं?

संजीव श्रीवास्तव ने कहा, "इस पीढ़ी को नई पीढ़ी, जेन ज़ी या जेन अल्फ़ा कुछ भी कहिए, यह पहले से तय हर नियम को चुनौती दे रही है."
"आप इस बदलाव को देख भी सकते हैं और महसूस भी कर सकते हैं."
उन्होंने कहा, "इसके पीछे सामाजिक और आर्थिक कारण, निराशा और आगे बढ़ने की उम्मीद, सब कुछ शामिल है."
"बदलते हालात से निपटने के लिए सरकार के पास कोई पहले से तैयार तरीक़ा या असरदार जवाब नहीं है."
"पिछले 10 से 12 साल में इस्तेमाल किए गए पुराने तरीक़े अब कम असरदार साबित हो रहे हैं. कई बार इनका उलटा असर भी हो सकता है, जैसा जुलाई में जंतर-मंतर पर दिखाई दिया."
"ख़ासकर उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत के युवाओं के बीच इसका असर कम हो रहा है. दक्षिण भारत में इसकी अपील की सीमाएं पहले ही दिखाई दे चुकी थीं."
"अब युवा अपनी शर्तें तय कर रहे हैं. लेकिन अभी इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाज़ी होगी."
आरती जेरथ ने कहा कि सरकार को समझ नहीं आ रहा कि इन हालात से कैसे निपटा जाए.
वह मानती हैं कि जेन ज़ी से जुड़ने की कई कोशिशें की जा रही हैं. मिसाल के तौर पर आरएसएस ऐसा करने की कोशिश कर रहा है.
सभी पार्टियों को जेन ज़ी चाहिए

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी जेन ज़ी को आकर्षित करने की योजना की घोषणा की है.
लेकिन जेरथ को यह बात अजीब लगी कि जब देश में रोज़गार और निवेश की ज़रूरत है, तब भारत की कुछ कंपनियां यहां अपने स्टील प्लांट बंद करके उन्हें अमेरिका में लगा रही हैं.
उन्होंने कहा, "इसलिए मैं सचमुच नहीं जानती कि सरकार इसे कैसे रोक सकती है."
"मैं केवल इतना कह सकती हूं कि अगले साल कुछ चुनाव होने वाले हैं. इनमें ख़ास तौर पर उत्तर प्रदेश के चुनाव शामिल हैं."
"मेरे ख़याल से यही चुनाव इस बात की असली परीक्षा होंगे कि बीजेपी और विपक्ष कहां खड़े हैं."
"इसलिए कोई फ़ैसला सुनाने से पहले हमें इन चुनावों का इंतज़ार करना होगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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