मक्का समझौते को लागू करने की तैयारी के बीच कैसे हैं पाकिस्तान और सऊदी अरब के सैन्य रिश्ते?

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सैन्य प्रशिक्षण और दूसरे सुरक्षा मामलों को लेकर कई रक्षा समझौते हुए हैं.
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    • Author, शाइस्ता फ़ारूक़ी
    • पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग, दक्षिण एशिया मामलों की विशेषज्ञ
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों के हमलों के बीच मक्का समझौते को लागू करने की तैयारी शुरू हुई है. इसके बाद सऊदी अरब में लंबे समय से जारी पाकिस्तान के सैन्य सहयोग पर एक बार फिर चर्चा हो रही है.

पाकिस्तान के वरिष्ठ सैन्य और सरकारी अधिकारियों का कहना है कि सुरक्षा को लेकर हाल में किए गए वादों को दोनों देशों के पुराने रक्षा संबंधों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए.

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सैन्य प्रशिक्षण, सलाह देने, सैनिकों की तैनाती और दूसरे सुरक्षा मामलों को लेकर पहले से ही कई रक्षा समझौते हैं.

इन समझौतों के साथ दोनों देशों के सुरक्षा संबंध लगातार बढ़े हैं. इससे पाकिस्तान इस क्षेत्र में सऊदी अरब के सबसे क़रीबी रक्षा सहयोगियों में शामिल हो गया है.

ताज़ा हालत समझें क्या हुआ है?

पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच मक्का समझौता हुआ है.
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच मक्का समझौता हुआ है, जिसमें एक दूसरे के लिए सैन्य मदद भी शामिल है

पाकिस्तान और सऊदी अरब के सैन्य सहयोग को लेकर चर्चा पांच अक्तूबर को रियाद में हुई मक्का गठबंधन की बैठक के बाद शुरू हुई.

इस गठबंधन में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की शामिल हैं.

बैठक में तीनों देश "आपसी सहमति से तय सैनिक और सैन्य क्षमताएं उपलब्ध कराने के लिए ज़रूरी क़दम उठाने" और सऊदी अरब में "उनकी जल्द तैनाती सुनिश्चित करने" पर सहमत हुए.

यह फ़ैसला ऐसे समय हुआ, जब सऊदी अरब पर हूतियों के हमले जारी हैं.

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सैनिकों की इस तैनाती को लेकर अटकलें बढ़ने पर पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ ने कहा कि पाकिस्तान और तुर्की की मौजूदगी इस क्षेत्र में पहले से है.

उन्होंने बताया कि दोनों देश निगरानी और अन्य कामों में सऊदी अरब की मदद कर रहे हैं.

ख़्वाजा आसिफ़ ने पांच अक्तूबर को पाकिस्तानी न्यूज़ चैनल जियो न्यूज़ के एक कार्यक्रम में कहा, "दोनों देशों की यहां मौजूदगी है, लेकिन लड़ाई सऊदी अरब की सेना लड़ रही है. हम यहां मौजूद हैं और उसे जिस तरह की मदद की ज़रूरत है, वह दे रहे हैं."

इस बीच पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता लेफ़्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ़ चौधरी ने सात अक्तूबर को सीएनएन से कहा कि पाकिस्तानी सैनिक कई दशकों से सऊदी अरब में मौजूद हैं और "कई तरह की ज़िम्मेदारियां निभा रहे हैं."

मक्का समझौते पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था अचानक सामने नहीं आई है.

उनका कहना था कि इसके पीछे पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक, सैन्य और कूटनीतिक संबंध हैं.

बाद में पाकिस्तान के कई मीडिया संस्थानों ने भी उनका यह बयान प्रकाशित किया.

'पाकिस्तान टुडे' अख़बार ने लिखा कि पाकिस्तानी सेना के नेतृत्व की ओर से पहली बार सार्वजनिक रूप से विस्तार से इस बात की पुष्टि की गई है कि पाकिस्तानी सैनिक पहले से सऊदी अरब में मौजूद हैं और "कई तरह की भूमिकाएं" निभा रहे हैं.

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सुरक्षा सहयोग किस तरह का है?

पाकिस्तान और सऊदी अरब कई दशकों से सुरक्षा के क्षेत्र में मिलकर काम कर रहे हैं.

दोनों देशों के समझौतों के तहत पाकिस्तानी सैन्यकर्मी नियमित रूप से सऊदी अरब में प्रशिक्षण देने, सलाह देने और दूसरे सहायक कामों के लिए तैनात होते रहे हैं.

दोनों देशों ने पहला रक्षा सहयोग समझौता 1967 में किया था.

साल 1982 में एक और रक्षा समझौते के ज़रिए इस सहयोग को मज़बूत किया गया. इसके तहत 'सऊदी-पाकिस्तानी आर्म्ड फ़ोर्सेज़ ऑर्गनाइज़ेशन' बनाया गया था.

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़, उस समय पाकिस्तान के 20 हज़ार से ज़्यादा सैनिक सऊदी अरब में तैनात थे.

इसके बाद भी दोनों देशों के बीच अलग-अलग रूप में ऐसा सहयोग जारी रहा.

पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ़ इस समय आतंकवाद के ख़िलाफ़ सऊदी अरब की अगुवाई वाले इस्लामी सैन्य गठबंधन का नेतृत्व कर रहे हैं. यह गठबंधन 2015 में बनाया गया था.

सऊदी और पाकिस्तान में कब से बढ़ा रक्षा सहयोग?

हाल के वर्षों में पाकिस्तान और सऊदी अरब मिलकर आपस में रक्षा सहयोग बना रहे हैं.
इमेज कैप्शन, हाल के वर्षों में पाकिस्तान और सऊदी अरब मिलकर आपस में रक्षा सहयोग बना रहे हैं

सितंबर 2025 में पाकिस्तान के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार 'डॉन' ने बताया था कि 1979 में मक्का की ग्रैंड मस्जिद पर हथियारबंद लोगों के क़ब्ज़े के बाद दोनों देशों का सुरक्षा सहयोग ख़ास तौर पर बढ़ा.

अख़बार के मुताबिक़, पाकिस्तानी विशेष बलों ने मस्जिद को हथियारबंद लोगों के क़ब्ज़े से छुड़ाने में सऊदी सैनिकों की मदद की थी.

फ़रवरी 2018 में पाकिस्तान ने आधिकारिक रूप से पुष्टि की थी कि सैनिकों की एक और टुकड़ी सऊदी अरब भेजी जा रही है.

अधिकारियों ने कहा था कि ये सैनिक वहां "प्रशिक्षण और सलाह देने" के लिए भेजे जा रहे हैं.

जियो न्यूज़ की वेबसाइट के मुताबिक़, उस समय पाकिस्तानी सेना की मीडिया शाखा ने कहा था कि यह तैनाती दोनों देशों के बीच पहले से जारी सुरक्षा सहयोग का हिस्सा है.

सेना ने यह भी कहा था कि पाकिस्तानी सैनिकों को सऊदी अरब के बाहर तैनात नहीं किया जाएगा.

'द न्यूज़' अख़बार ने तत्कालीन रक्षा मंत्री ख़ुर्रम दस्तगीर के हवाले से बताया था कि इस तैनाती का मक़सद सैन्य प्रशिक्षण और सहयोग के ज़रिए ज़मीन पर अपनी रक्षा करने की सऊदी अरब की क्षमता को मज़बूत करना था.

उस समय की मीडिया रिपोर्टों में कहा गया था कि मौजूदा समझौतों के तहत पाकिस्तान के एक हज़ार से ज़्यादा सैन्यकर्मी पहले से सऊदी अरब में तैनात थे.

'एक्सप्रेस ट्रिब्यून' ने फ़रवरी 2018 में सुरक्षा सूत्रों के हवाले से लिखा था कि इस तैनाती में "कुछ भी नया" नहीं था.

रिपोर्ट के मुताबिक़, दोनों देशों का रक्षा सहयोग 1982 के उस समझौते पर आधारित था, जिसके तहत पाकिस्तानी सैनिकों को सऊदी अरब में प्रशिक्षण देने, सलाह देने और तैनात करने की व्यवस्था की गई थी.

इस ख़बर के मुताबिक़, 2018 में पाकिस्तान के क़रीब 1,379 सैन्यकर्मी सऊदी अरब में पहले से तैनात थे. इनमें थल सेना, वायु सेना और नौसेना के सदस्य शामिल थे.

रिपोर्टों के मुताबिक़, बाद में भेजी गई अतिरिक्त टुकड़ी में एक हज़ार से ज़्यादा सैनिक थे.

समझौते में कहा गया- एक देश पर हमला, दोनों देशों पर हमला माना जाएगा

रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ पाकिस्तान ने 2025 से सऊदी अरब में '30 हज़ार से 40 हज़ार सैनिक तैनात किए हैं'.
इमेज कैप्शन, रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ पाकिस्तान ने 2025 से सऊदी अरब में '30 हज़ार से 40 हज़ार सैनिक तैनात किए हैं'

'एक्सप्रेस ट्रिब्यून' की एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक़, तत्कालीन प्रधानमंत्री शाहिद ख़ाक़ान अब्बासी ने बाद में पुष्टि की थी कि सऊदी अरब में तैनात पाकिस्तानी सैनिक वहां की सेनाओं को प्रशिक्षण दे रहे थे.

हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने के साथ दोनों देशों का रक्षा सहयोग भी मज़बूत हुआ है.

सितंबर 2025 में पाकिस्तान और सऊदी अरब ने 'स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफ़ेंस एग्रीमेंट' यानी रणनीतिक आपसी रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए.

इस समझौते में कहा गया है कि दोनों में से किसी एक देश पर हमला, दोनों देशों पर हमला माना जाएगा.

अप्रैल 2026 में सऊदी अरब के रक्षा मंत्रालय ने बताया कि इस समझौते के तहत पाकिस्तान के सैनिक और सैन्य विमान सऊदी अरब पहुंच गए हैं.

हाल में समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि पाकिस्तान ने 2025 से सऊदी अरब में "30 हज़ार से 40 हज़ार सैनिक तैनात किए हैं."

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि मक्का समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद पाकिस्तान ने सऊदी अरब को सैन्य उपकरण दिए हैं.

लेकिन पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय ने छह अक्तूबर को इन दावों को "अटकलों पर आधारित" बताते हुए ख़ारिज कर दिया.

मंत्रालय ने कहा कि साझा रक्षा व्यवस्था को लागू करने से जुड़ी सैन्य कार्रवाइयों की जानकारी गोपनीय है.

सात अक्तूबर को 'द फ़्राइडे टाइम्स' में प्रकाशित एक लेख में कहा गया कि पाकिस्तान पर सऊदी अरब की बढ़ती निर्भरता दिखाती है कि दोनों देशों का सहयोग अब सैन्य प्रशिक्षण से आगे बढ़कर सीधे रक्षा कार्रवाइयों तक पहुंच रहा है.

लेख में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि "सऊदी अरब को अब भी पाकिस्तान की सेना की ज़रूरत है."

पाकिस्तान को फ़ायदा होगा या नुक़सान?

सऊदी अरब से क़रीबी रिश्तों के कारण पाकिस्तान को रणनीतिक और आर्थिक फ़ायदे मिलते हैं.

पाकिस्तान जब भी आर्थिक मुश्किलों में रहा है, सऊदी अरब ने उसकी वित्तीय मदद की है.

मक्का समझौते को लागू करने की हाल की कोशिशों को देखते हुए पाकिस्तान के प्रमुख मीडिया संस्थानों ने सरकार और सेना से सावधानी से आगे बढ़ने को कहा है.

उन्होंने कहा है कि पाकिस्तान को किसी बड़े युद्ध में शामिल होने से बचना चाहिए.

'द फ़्राइडे टाइम्स' के लेख में चेतावनी दी गई कि "सऊदी अरब की रक्षा" में पाकिस्तान की भूमिका उसे "उस युद्ध के और क़रीब ले जा सकती है, जिसमें उसने 2015 में शामिल होने से इनकार कर दिया था."

यह बात यमन के गृहयुद्ध के संदर्भ में कही गई थी.

लेख में कहा गया, "इन रिश्तों का भविष्य शायद इस बात पर कम निर्भर करेगा कि सऊदी अरब में पाकिस्तान के कितने सैनिक मौजूद हैं."

"यह इस बात पर ज़्यादा निर्भर करेगा कि रियाद और इस्लामाबाद इस मुद्दे पर कब तक सहमत रहते हैं कि सऊदी अरब की रक्षा करना कहां ख़त्म होता है और उसकी ओर से युद्ध लड़ना कहां से शुरू होता है."

'डॉन' ने सात अक्तूबर को मक्का समझौते को दोनों देशों के कई दशक पुराने रक्षा संबंधों को "और मज़बूत बनाने वाला" क़दम बताया.

हालांकि, अख़बार ने पाकिस्तान को किसी दूसरे युद्ध में सीधे शामिल होने से बचने की सलाह दी.

अख़बार ने "बाहरी हमले से सऊदी अरब की रक्षा" की कोशिशों का समर्थन किया.

लेकिन उसने कहा कि "पाकिस्तानी सैनिकों को ज़मीन पर लड़ने के लिए यमन भेजने से बचना चाहिए."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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