'कोहिनूर' से क्या है पानी में डूबे इस गांव का कनेक्शन, आज भी लोग तलाश रहे हैं हीरे

ऐतिहासिक रिकॉर्ड के मुताबिक़, कम से कम 800 साल पहले कोल्लूर अपनी विश्व प्रसिद्ध हीरा खदान के लिए जाना जाता था.
इमेज कैप्शन, ऐतिहासिक रिकॉर्ड के मुताबिक़, कम से कम 800 साल पहले कोल्लूर अपनी विश्व प्रसिद्ध हीरा खदान के लिए जाना जाता था
    • Author, बल्ला सतीश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 14 मिनट

जब सड़कों पर ढेर के ढेर हीरे बिकने की बात होती है, तो लोगों के मन में सबसे पहले विजयनगर साम्राज्य का नाम आता है.

दक्षिण भारत में आज भी लोग बताते हैं कि राया शासकों के दौर में हम्पी की सड़कों पर हीरों का कितना बड़ा कारोबार होता था. इसे लेकर फ़िल्में भी बनाई गई हैं.

लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसी इलाक़े पर शासन करने वाला एक और साम्राज्य भी हीरों के कारोबार के लिए उतना ही मशहूर था.

यह था गोलकोंडा साम्राज्य, जिसकी राजधानी को आज हैदराबाद के नाम से जाना जाता है.

वो जगह जहां सबसे ज़्यादा हीरे मिलते थे

विजयनगर, बीजापुर और गोलकोंडा जैसे साम्राज्यों की पहचान हीरों के कारोबार से होने लगी थी.
इमेज कैप्शन, विजयनगर, बीजापुर और गोलकोंडा जैसे साम्राज्यों की पहचान हीरों के कारोबार से होने लगी थी

आज ज़्यादातर तेलुगू लोगों के लिए गोलकोंडा का मतलब केवल एक पुराना क़िला है. लेकिन अंग्रेज़ी भाषा में 'गोलकोंडा' शब्द का इस्तेमाल क़िस्मत और समृद्धि के लिए होने लगा. इसकी वजह समझना मुश्किल नहीं है.

यह कहा जा सकता है कि जिस तरह हम्पी की सड़कों पर बड़े पैमाने पर हीरों का कारोबार होता था, वैसा ही कारोबार आज के हैदराबाद के पुराने शहर में मौजूद कारवां इलाक़े की सड़कों पर भी होता था.

18वीं सदी तक भारत दुनिया में हीरों का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण स्रोत था.

अफ़्रीका और दक्षिण अमेरिका में हीरों की खदानें 18वीं सदी के बाद ही मिली थीं.

दक्षिण भारत में कृष्णा, तुंगभद्रा और पेन्ना नदियों के आसपास के इलाक़े इन हीरों का मुख्य स्रोत थे.

यही वजह थी कि विजयनगर, बीजापुर और गोलकोंडा जैसे साम्राज्य यानी पूरे दक्कन क्षेत्र की पहचान हीरों के कारोबार से होने लगी थी.

कभी गोलकोंडा साम्राज्य का हिस्सा रहा कोल्लूर गांव आज आंध्र प्रदेश के पलनाडु ज़िले में है.

वहां पहुंचने के लिए बेल्लमकोंडा से खेतों, पेड़ों और पहाड़ियों के बीच होकर गुज़रना पड़ता है.

आगे का रास्ता इतना संकरा है कि ट्रैक्टर और बाइक के अलावा कोई दूसरा वाहन वहां नहीं जा सकता.

मोबाइल नेटवर्क और बिजली से दूर इस गांव में गिने-चुने घर ही दिखाई देते हैं.

इसके बावजूद दूर-दूर से आए कुछ लोग कई हफ़्तों तक अपने परिवारों से दूर रहकर यहां ज़मीन खोदते और रेत छानते रहते हैं.

ऐतिहासिक दस्तावेज़ बताते हैं कि करीब 800 साल पहले कोल्लूर अपनी विश्व प्रसिद्ध हीरे की खदान के लिए जाना जाता था.

इस जगह के बारे में अधिक जानने के लिए उन किताबों को पढ़ना पड़ता है, जो कम से कम 400 साल पहले यूरोप से आए यात्रियों और व्यापारियों ने लिखी थीं.

हीरों वाला गांव पानी में समा गया

पुलिचिंतला जलाशय के कारण कोल्लूर गांव पानी में डूब गया.
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यह बात साल 1618 से 1622 के बीच की है. विलियम मेथोल्ड नाम के एक विदेशी यात्री यूरोप से कोल्लूर पहुंचे थे. वहां लोगों की भीड़ देखकर वह हैरान रह गए.

उन्होंने लिखा कि गांव के पास मौजूद हीरे की खदानों में 30 हज़ार लोग काम करते थे.

उनके लिखने के करीब 50 साल बाद, साल 1665 में फ़्रांस के यात्री बैप्टिस्ट टैवर्नियर इसी जगह पहुंचे.

उन्होंने दर्ज किया कि इस गांव की हीरा खदानों में 30 हज़ार नहीं, बल्कि 60 हज़ार लोग काम करते थे.

इन दोनों के अलावा मार्को पोलो, हेनरी होवर्ड और कॉलिन मैकेंज़ी समेत कई लोगों ने इन हीरा खदानों के बारे में विस्तार से लिखा है.

बाद के वर्षों में यह गांव जलाशय में डूब गया और पूरी तरह पानी में समा गया.

करीब एक दशक पहले ख़ाली हो चुके इस गांव में अब केवल चार परिवार रहते हैं. ये परिवार बकरी पालन कर अपना गुज़ारा करते हैं.

यहां से नाव में बैठकर कृष्णा नदी पर बने पुलिचिंतला जलाशय में कुछ किलोमीटर आगे जाने पर पानी के बीच एक टापू दिखाई देता है.

असल में यह डूब चुके गांव का ऊंचा टीला है.

कुछ लोग यहां छोटे-छोटे तंबुओं में रहते हैं और ज़मीन खोदकर हीरे तलाशते हैं.

आज भी यहां हीरे मिलने की बातें सामने आती हैं. इसी वजह से बड़ी संख्या में लोग अपनी क़िस्मत आज़माने आते हैं.

बीबीसी की टीम ने 2018 में यहां का दौरा किया था. उस समय भी दर्जनों लोग हीरों की तलाश कर रहे थे.

बीबीसी की टीम 2025 में एक बार फिर इस गांव पहुंची.

खदान का दूसरा नाम बन गया था कोल्लूर

सीधे शब्दों में कहें तो कोल्लूर गांव एक समय 'खदान' शब्द का दूसरा नाम बन गया था.

उस दौर में यह गांव इतना मशहूर था कि खदान का मतलब ही कोल्लूर माना जाने लगा था.

भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी जीएसआई के रिटायर्ड वैज्ञानिक एसवी सत्यनारायण ने बीबीसी को बताया, "18वीं सदी तक दक्षिण भारत का दक्कन क्षेत्र हीरों का एक बड़ा स्रोत था."

"केवल कोहिनूर ही नहीं, ग्रेट मोगल, रीजेंट, ऑर्लोफ़, निज़ाम और होप जैसे हीरे भी यहीं मिले थे."

"ख़ास तौर पर 13वीं से 17वीं सदी के बीच हीरों का कारोबार काफ़ी फला-फूला था."

सत्यनारायण ने बताया, "आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कृष्णा और पेन्ना नदियों की घाटियों में बड़ी संख्या में हीरे मिलते थे."

"यहां-वहां मौजूद छोटी खदानों को छोड़ दें, तो यह इलाक़ा दुनिया में हीरों का सबसे बड़ा स्रोत था. साल 1725 में ब्राज़ील में हीरे की खदानें मिलने तक यही स्थिति रही."

"अंग्रेज़ों के आने से पहले भारत के विदेशी व्यापार में हीरों की महत्वपूर्ण भूमिका थी. विजयनगर, बीजापुर और गोलकोंडा साम्राज्यों के दौर में ये हीरे बहुत मशहूर हुए."

इतिहास के शोधकर्ता और पत्रकार नानीसेट्टी शेरीश ने बीबीसी को बताया, "ज़्यादातर हीरे तुंगभद्रा और कृष्णा नदियों के आस-पास मिलते थे. इनमें कोल्लूर सबसे अधिक मशहूर था."

"रावुलकोंडा जैसी दूसरी खदानें भी थीं. गांडीकोटा जैसे व्यापारिक केंद्र भी मौजूद थे."

"विजयनगर साम्राज्य हीरों के लिए बहुत मशहूर था. बाद के वर्षों में बीजापुर और गोलकोंडा साम्राज्यों का प्रभाव बढ़ा."

"हीरों से कई दिलचस्प कहानियां भी जुड़ी हैं. कुछ हीरों को शापित भी बताया जाता है."

"आमतौर पर गर्मियों में नदी का पानी सूखने के बाद जो ज़मीन बाहर निकलती है, लोग उसमें हीरों की तलाश करते हैं."

कारवां: हीरे तराशने के लिए मशहूर इलाक़ा

कोल्लूर में आज भी कुछ लोग हीरों की तलाश कर रहे हैं.
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साल 1518 से 1687 के बीच क़ुतुबशाही शासकों ने हैदराबाद से गोलकोंडा साम्राज्य पर शासन किया था.

पश्चिम में गुजरात के सूरत से लेकर पूर्व में आंध्र प्रदेश के मछलीपट्टनम तक यह साम्राज्य फैला हुआ था.

पुराने समय से ही ये दोनों शहर अंतरराष्ट्रीय व्यापार के महत्वपूर्ण केंद्र थे.

इनके बीच हैदराबाद था, जो गोलकोंडा साम्राज्य का एक महत्वपूर्ण केंद्र था.

हैदराबाद के पुराने शहर में मौजूद कारवां इलाक़ा कभी हीरों को घिसने, तराशने और बेचने के लिए मशहूर था.

गुजराती, मारवाड़ी और दूसरे भारतीय व्यापारी आकर कारवां में बस गए थे. विदेशी लोगों का भी यहां लगातार आना-जाना लगा रहता था.

नानीसेट्टी शेरीश के मुताबिक़, "फ़्रांस के यात्री थेवनो ने लिखा था कि गोलकोंडा का राज्य हीरों की धरती था."

"17वीं सदी तक गोलकोंडा के शासन में हीरों की 23 और बीजापुर के शासन में 15 खदानें थीं. इन खदानों में बड़ी संख्या में लोगों को रोज़गार मिलता था."

"कहा जाता है कि औरंगज़ेब ने गोलकोंडा पर हमला किया था, तो उसके पीछे एक वजह वहां बड़ी मात्रा में हीरों का मौजूद होना भी था."

शेरीश ने बीबीसी को बताया, "पुराने समय में राजा हीरों की तलाश के लिए एक तय रक़म देते थे."

"अगर किसी को एक कैरेट या उससे कम वज़न का हीरा मिलता, तो उसे गिरफ़्तार किया जा सकता था. लेकिन अगर हीरे का वज़न इससे अधिक होता, तो उसे राजा को सौंपना पड़ता था."

"इसी वजह से बड़ी खदानों के आसपास रहने वाले लोग जब शाम को घर लौटते थे, तो उनके कपड़े उतरवाकर जांच की जाती थी. यह देखा जाता था कि कहीं वे कोई हीरा छिपाकर तो नहीं ले जा रहे."

"खदान में जितने मज़दूर होते थे, लगभग उतने ही चौकीदार भी रखे जाते थे."

शेरीश के मुताबिक़, "विजयनगर साम्राज्य के पतन के बाद गोलकोंडा का राज्य हीरा व्यापारियों के एक बड़े केंद्र के रूप में उभरा."

क्या कोहिनूर यहीं मिला था?

इतिहास के शोधकर्ता और पत्रकार नानीसेट्टी शेरीश.
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कोहिनूर हीरा असल में कहां मिला था, इसका कोई साफ़ प्रमाण नहीं है.

हालांकि, अधिकतर इतिहासकार और भूवैज्ञानिक मानते हैं कि यह कोल्लूर की खदान से मिला था.

कोहिनूर के शाहजहां के पास पहुंचने के बाद का इतिहास साफ़ तौर पर दर्ज है.

इतिहास में बताया गया है कि यह हीरा किस तरह एक हाथ से दूसरे हाथ में पहुंचा और आख़िर में ब्रिटेन के शाही मुकुट का हिस्सा बना.

लेकिन यह शाहजहां के पास कैसे पहुंचा था, इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है.

शेरीश कहते हैं, "कोहिनूर को लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं."

"मेरे शोध के मुताबिक़, यह कोल्लूर की खदान से सीधे गांडीकोटा के शासक मीर जुमला के पास पहुंचा था."

"मीर जुमला ने अपनी वफ़ादारी दिखाने के लिए इसे तोहफ़े के रूप में शाहजहां को दिया था."

वह कहते हैं, "मुग़ल दस्तावेज़ों में हीरे के रंग, आकार, पानी जैसी साफ़ चमक, पारदर्शिता और लाल मखमल के कपड़े में लिपटे उसके डिब्बे का जो विवरण मिलता है, वह कोहिनूर से मेल खाता है."

"उस समय इतने बड़े हीरे मिलने वाली एकमात्र खदान कोल्लूर थी."

"मीर जुमला के पास पहुंचने तक इस हीरे का कोई नाम नहीं था. शाहजहां ने इसे 'कोहिनूर' नाम दिया था. फ़ारसी भाषा में इसका मतलब 'रोशनी का पहाड़' होता है."

फ़्रांस के यात्री बैप्टिस्ट टैवर्नियर ने मीर जुमला के पास मौजूद हीरों का विस्तार से वर्णन किया है.

टैवर्नियर ने लिखा था कि मीर जुमला के पास हीरों के ढेर थे.

जीएसआई के रिटायर्ड वैज्ञानिक एसवी सत्यनारायण की भी यही राय है.

उन्होंने बताया, "कोहिनूर शायद साल 1656 या फिर 1304 में कोल्लूर से मिला था."

शेरीश कहते हैं, "कोहिनूर कब मिला और उस समय उसका वज़न कितना था, इसे लेकर शक हो सकता है."

"लेकिन यह कृष्णा नदी की घाटी से मिला था, इसे लेकर कोई शक नहीं है."

एसवी सत्यनारायण की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक़, कोहिनूर के अलावा दूसरे मशहूर हीरे कहां से मिले थे, उसका ब्योरा इस तरह है.

आज कहां हैं हीरों की वे खदानें?

जीएसआई के रिटायर्ड वैज्ञानिक एसवी सत्यनारायण.
इमेज कैप्शन, जीएसआई के रिटायर्ड वैज्ञानिक एसवी सत्यनारायण

आज के आंध्र प्रदेश में अनंतपुर, कुरनूल, कृष्णा और गुंटूर ज़िलों में बड़ी संख्या में हीरे मिलते थे.

इसके अलावा आज के तेलंगाना के महबूबनगर ज़िले, कर्नाटक के रायचूर, महाराष्ट्र के वैरागढ़ और आंध्र प्रदेश के मौजूदा प्रकाशम और कडप्पा ज़िलों में भी कुछ हीरे मिलते थे.

जीएसआई के रिटायर्ड वैज्ञानिक एसवी सत्यनारायण ने बीबीसी को बताया कि हेनरी होवर्ड ने 1677 में एक दस्तावेज़ तैयार किया था.

इसी दस्तावेज़ के आधार पर इन जगहों की पहचान हीरों की पुरानी खदानों के रूप में होती है.

हीरे इसी इलाक़े में क्यों मिलते थे?

हीरे मुख्य रूप से किंबरलाइट, लैंप्रोइट, कॉन्ग्लोमरेट यानी अलग-अलग चट्टानों के टुकड़ों से बनी चट्टान और ग्रैवल यानी कंकड़ की परतों के साथ जुड़े होते हैं.

जीएसआई के रिटायर्ड वैज्ञानिक एसवी सत्यनारायण ने बताया, "ये सभी पुरानी खदानें अधिकतर नदियों की लाई मिट्टी और चट्टानों, किंबरलाइट, लैंप्रोइट और मिट्टी की ऊपरी परत वाले इलाक़ों में मौजूद थीं."

"कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों के संगम से लेकर विजयवाड़ा तक करीब 300 किलोमीटर के इलाक़े में ये खदानें फैली हुई थीं."

"इस इलाक़े में आज के कृष्णा, गुंटूर, महबूबनगर, कुरनूल, प्रकाशम, कडप्पा और अनंतपुर ज़िले आते हैं."

"सबसे अधिक खनन कोल्लूर-परिताला पट्टी में हुआ था."

"कोहिनूर, ग्रेट मोगल, पिट या रीजेंट, ऑर्लोफ़, निज़ाम और होप जैसे हीरे इसी इलाक़े से मिले थे."

"तुंगभद्रा और कृष्णा नदियों के संगम से लेकर कोल्लूर-परिताला के नाम से पहचाने जाने वाले इस पूरे इलाक़े में हीरे मिलते थे."

सत्यनारायण के मुताबिक़, कुरनूल ज़िले के रामल्लकोट, बनगानपल्ले, वज्रगिरि और मुनिमडुगु, गुंटूर ज़िले के कोल्लूर और कृष्णा ज़िले के मल्लवेल्ली इलाक़े में कॉन्ग्लोमरेट प्रकार की चट्टानें पाई जाती हैं.

अनंतपुर और कुरनूल ज़िलों के वज्रकरूर और जोन्नागिरि इलाक़ों में भी हीरों का खनन होता था.

अनंतपुर ज़िले के वज्रकरूर की किंबरलाइट चट्टानें और कुरनूल की चेलिमा की लैंप्रोइट चट्टानें भी इस सिलसिले में जानी जाती हैं.

इन इलाक़ों की ज़मीन में हीरे मिलते थे.

सत्यनारायण ने बताया, "कृष्णा ज़िले की ग्रैवल खदानों और विजयनगर साम्राज्य के वज्रकरूर इलाक़े के खुदाई स्थलों से बड़ी संख्या में हीरे मिले थे."

"होवर्ड ने 1677 में लिखा था कि साल 1610 के आसपास पुर्तगाल के एक यात्री को वज्रकरूर में 400 कैरेट से ज़्यादा वज़न का हीरा मिला था."

"गार्सिया दा ओर्ता के दस्तावेज़ों के मुताबिक़, साल 1534 में विजयनगर में मुर्गी के छोटे अंडे जितना बड़ा एक हीरा मिला था."

"इसके साथ करीब 150, 175 और 312 कैरेट के तीन दूसरे हीरे भी मिले थे."

"उन्होंने यह जानकारी भी दर्ज की थी कि कौन-सा हीरा किस साल किस राजा के हाथ लगा था."

अब वहां खुदाई क्यों नहीं होती?

कोहिनूर हीरा.
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इतिहास में कोल्लूर जैसी जगहों पर 13वीं से 18वीं सदी तक यानी करीब 600 साल तक बड़े पैमाने पर खनन हुआ था.

इसके अलावा कई दूसरी खदानों से भी सैकड़ों वर्षों तक हीरे मिलते रहे थे.

शेरीश कहते हैं, "किसी भी हीरा खदान से बड़ी संख्या में हीरे मिलें, तभी वहां खनन करना फ़ायदेमंद होता है."

"अगर ऐसा नहीं हो, तो औद्योगिक स्तर पर खनन करना संभव नहीं होता."

इन खदानों के साथ भी यही समस्या हुई.

उस समय के राजाओं के शासन के दौरान इन सभी खदानों से बड़ी मात्रा में हीरे निकाले जा चुके थे.

अब वहां कुछ नहीं बचा है.

इसका मतलब यह नहीं है कि वहां हीरे बिल्कुल नहीं मिलते.

समय-समय पर यहां-वहां कोई हीरा मिल जाता है. लेकिन इतने हीरे नहीं मिलते कि औद्योगिक स्तर पर खनन किया जा सके.

एसवी सत्यनारायण कहते हैं, "साल 1725 के बाद ब्राज़ील में हीरों की नई खदानों का मिलना, साम्राज्यों का पतन और सबसे महत्वपूर्ण हीरा कारोबार में आई मंदी ऐसे कारण थे, जिनकी वजह से यहां की खदानें बंद होने लगीं."

"हालांकि, यहां-वहां हीरों की तलाश आज भी होती है."

"साल 1890 से 1894 के बीच हैदराबाद डेक्कन कंपनी ने आज के परिताला के पास दोबारा हीरों की तलाश शुरू की थी."

"लेकिन यह काम फ़ायदेमंद साबित नहीं हुआ और इसे बंद कर दिया गया."

"साल 1825 में वोयसी ने लिखा था कि कृष्णा और पेन्ना नदियों की घाटियों में मौजूद खदानें लगभग ख़ाली हो चुकी थीं."

"वहां बड़े पैमाने पर हीरों का उत्पादन नहीं हो रहा था और कुछ छोटी खदानें तलाशने की कोशिश की जा रही थी."

सत्यनारायण ने बताया, "साल 1950 के बाद भारत सरकार ने भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के मार्गदर्शन में इन इलाक़ों में हीरों का खनन करने की कोशिश की थी."

"गुंटूर और कृष्णा ज़िलों के कोल्लूर, चंद्रलपाडु और परिताला इलाक़ों में खुदाई की गई थी."

"किंबरलाइट और लैंप्रोइट चट्टानों की भी तलाश की गई. लेकिन इसके कोई ख़ास नतीजे नहीं मिले."

"वहां बहुत छोटे हीरे मिलते थे. औद्योगिक स्तर पर खनन फ़ायदेमंद न होने के कारण ये कोशिशें छोड़ दी गईं."

अब यहां हीरे कौन तलाशता है?

कोल्लूर जैसी जगहों पर करीब 600 वर्षों तक बड़े पैमाने पर हीरों का खनन होता रहा.
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आज आम लोग, ग़रीब परिवार और निम्न मध्यवर्ग के कई लोग अपनी क़िस्मत आज़माने के लिए इन इलाक़ों में हीरे तलाशते हैं.

उनका कहना है कि मानसून के शुरुआती दिनों में यहां हीरे मिलने की संभावना अधिक होती है.

कुरनूल ज़िले के जोन्नागिरि, अनंतपुर ज़िले के वज्रकरूर, कृष्णा ज़िले के परिताला और गुंटूर ज़िले के कोल्लूर में मई के आख़िरी दिनों से जुलाई के अंत तक दोनों तेलुगू राज्यों से लोग हीरों की तलाश में आते हैं.

कुछ लोग अपने साथ चावल, नमक, तेल और मिर्च जैसी ज़रूरी चीज़ें लेकर आते हैं.

वे यहां मछलियां पकड़ते हैं या सप्ताह के आख़िर में लगने वाले बाज़ार से सब्ज़ियां ख़रीदते हैं.

इसके बाद वे वहीं रुककर हीरों की तलाश करते हैं.

कुछ लोग अपने परिवारों के साथ आते हैं, जबकि कुछ अपने परिवार को घर छोड़कर अकेले पहुंचते हैं.

कुछ लोग दोस्तों और रिश्तेदारों के समूह में आते हैं.

वहीं, कुछ लोग सप्ताह के बाक़ी दिनों में काम करते हैं और छुट्टी वाले दिन हीरे तलाशने के लिए यहां आते हैं.

बीबीसी ने यहां हीरे खोज रहे कई लोगों से बात की.

किसी ने यह नहीं कहा कि उसे कोई हीरा मिला है.

लेकिन वे ऐसी कहानियां ज़रूर सुनाते हैं कि किसी व्यक्ति को एक ख़ास जगह पर हीरा मिला था, वह बहुत क़ीमती था और उसने वह हीरा किसी दूसरे व्यक्ति को बेच दिया.

ऐसी कई कहानियां सुनने को मिलती हैं.

इनमें कितनी सच्ची हैं और कितनी काल्पनिक, यह तय करना मुश्किल है.

पिडुगुरला की रहने वाली विजयम्मा को मिर्च और कपास की खेती में नुक़सान हुआ था.

उन्होंने क़र्ज़ चुकाने के लिए हीरा मिलने की उम्मीद में एक महीने तक कोल्लूर में तलाश की.

विजयम्मा ने कहा, "जिसे हीरा मिलना होगा, उसे मिल जाएगा. कोई भी इसके बारे में किसी को नहीं बताता."

"मुझे डर लगता है कि अगर किसी को पता चल गया, तो वह हीरा तलाशने वाले व्यक्ति के साथ क्या करेगा."

"हम तो अचार के साथ खाना खाकर गुज़ारा कर लेते हैं."

एर्रागोंडापालेम इलाक़े की नरसम्मा भी सात महीने तक कोल्लूर में रही थीं.

वह हर महीने अपनी पेंशन लेने के लिए अपने गांव जाती थीं और बाक़ी समय अपने पति के साथ हीरों की तलाश करती थीं.

उन्होंने कहा, "हम यह मेहनत अपना क़र्ज़ चुकाने के लिए कर रहे हैं."

यहां के कई स्थानीय लोग अब हीरों के दलाल बन गए हैं.

उनके पास हीरों की गुणवत्ता जांचने वाली मशीनें भी हैं.

अगर किसी व्यक्ति को कोई ऐसा पत्थर मिलता है, जिसके हीरा होने का शक हो, तो वह उसे दलाल के पास ले जाता है.

दलाल उसकी गुणवत्ता की जांच करता है, हीरा व्यापारियों से उसकी क़ीमत को लेकर बातचीत करता है और फिर उसे बिकवाता है.

हालांकि, यह नहीं कहा जा सकता कि ये सभी गतिविधियां क़ानूनी दायरे के भीतर होती हैं.

हीरों के बारे में क्या लिखा गया है?

हैदराबाद डेक्कन कंपनी ने 1890 से 1894 के बीच आज के परिताला के पास हीरों का खनन शुरू किया था, लेकिन फ़ायदेमंद न होने के कारण इसे बंद करना पड़ा.
इमेज कैप्शन, हैदराबाद डेक्कन कंपनी ने 1890 से 1894 के बीच आज के परिताला के पास हीरों का खनन शुरू किया था, लेकिन फ़ायदेमंद न होने के कारण इसे बंद करना पड़ा

प्राचीन भारतीय साहित्य में महाभारत से लेकर कौटिल्य के अर्थशास्त्र तक कई ग्रंथों में हीरों का ज़िक्र मिलता है.

हालांकि, जिन खदानों से हीरे निकाले जाते थे, उन इलाक़ों का विस्तार से वर्णन बहुत कम मिलता है.

इन खदानों के बारे में ज़्यादातर जानकारी विदेशी यात्रियों, व्यापारियों और यूरोप के औपनिवेशिक प्रशासकों के लेखन से मिलती है.

13वीं सदी में आज के प्रकाशम ज़िले में मौजूद मोटुपल्ली बंदरगाह इलाक़े का दौरा करने वाले मार्को पोलो ने इन हीरा खदानों के बारे में लिखा था.

कहा जाता है कि उन्होंने कृष्णा नदी की घाटी में मौजूद हीरा खदानों का दौरा किया था.

कई शोधकर्ताओं का मानना है कि मोटुपल्ली के पास कृष्णा घाटी में मौजूद वह जगह कोल्लूर हो सकती है.

मार्को पोलो ने लिखा था, "इस राज्य के अलावा दुनिया में कहीं और हीरे नहीं मिलते. यहां आपको बहुत से अच्छे हीरे मिलेंगे."

इन सभी यात्रियों में फ़्रांस के यात्री जीन बैप्टिस्ट टैवर्नियर ने सबसे विस्तार से जानकारी दी थी.

वह ख़ुद हीरों के व्यापारी थे. इसलिए उन्होंने हीरा खदानों, उत्पादन, उद्योग, कारोबार, हीरे तराशने की प्रक्रिया, उनके वज़न और गुणवत्ता के बारे में लिखा था.

यूरोप के लेखकों ने यहां मौजूद खदानों के प्रकार और उनसे मिलने वाले हीरों के बारे में भी दर्ज किया था.

इनमें कोल्लूर की खदान का सबसे अधिक दौरा किया गया और उसी के बारे में सबसे अधिक विस्तार से लिखा गया.

उन्होंने यह भी लिखा कि मल्लवरम, कोडवतिकाल और परिताला भी बड़ी खदानें थीं.

साल 1814 में हीनी नाम के एक लेखक ने लिखा था कि कोडवतिकाल में इतने हीरे मिले थे कि उन्हें बैलगाड़ियों में भरकर ले जाया जा सकता था.

उन्होंने पेन्ना, कुंडेरु और हिंद्री नदियों के किनारे मौजूद जगहों समेत रायलसीमा के कई इलाक़ों के बारे में भी लिखा था.

कोल्लूर आज भले ही इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह गया है और समय के साथ भौतिक रूप से खो चुका है.

लेकिन बहुत से लोगों के लिए यह आज भी अपनी क़िस्मत आज़माने की उम्मीद वाली जगह है.

उन्हें लगता है कि यहां मिलने वाला एक हीरा उनकी पूरी ज़िंदगी बदल सकता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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