दक्षिण अफ़्रीका का ज़मीन से जुड़ा क्या है वो क़ानून जिससे ट्रंप हैं ख़फ़ा

दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति सिरील रामाफ़ोसा
इमेज कैप्शन, दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति सिरील रामाफ़ोसा ने एक ऐसा क़ानून बनाया है जिसके तहत निजी संपत्ति को सार्वजनिक इस्तेमाल करने के लिए मुआवज़ा देकर ज़ब्त किया जा सकता है.
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पढ़ने का समय: 13 मिनट

दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति सिरील रामाफ़ोसा ने जनवरी 2025 में ऐसा क़ानून बनाया है जिसके तहत किसी की भी निजी संपत्ति को सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए मुआवज़ा देकर ज़ब्त किया जा सकता है. इसे एक्सप्रोप्रियेशन एक्ट या ज़मीन ज़ब्ती क़ानून कहा जाता है.

दुनिया में अधिकांश सरकारों के पास ऐसे अधिकार हैं लेकिन दक्षिण अफ़्रीका का यह क़ानून उनसे अलग है. इसके तहत कुछ विशेष स्थितियों में बिना मुआवज़ा दिए भी ज़मीन जब्त की जा सकती है.

दक्षिण अफ़्रीका में श्वेत अल्पसंख्यक सरकार को गए तीस साल बीत गए हैं, लेकिन भूमि वितरण में असमानता बरकरार है. देश के राजनीतिक हालात में हाल में काफ़ी बदलाव आया है और एक्सप्रोप्रिएशन बिल पर संसद में बहस शुरू हुई है.

इस नए क़ानून से जहां दक्षिण अफ़्रीका की घरेलू चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित हुआ है वहीं इसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना भी हो रही है. दुनिया जहान में यही जानने की कोशिश करेंगे कि क्या दक्षिण अफ़्रीका भूमि असमानता का हल निकाल सकता है?

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ऊबड़ -खाबड़ ज़मीन

महिलाओं और पुरुषों की कतार
इमेज कैप्शन, साल 2025 में दक्षिण अफ़्रीका की कुल आबादी में केवल साढ़े सात प्रतिशत आबादी ही श्वेत है.

थूला सिंपसन दक्षिण अफ़्रीका की प्रेटोरिया यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसर हैं और दक्षिण अफ़्रीका के राजनीतिक इतिहास पर किताबें लिख चुके हैं.

वो बताते हैं कि देश में भूमि समस्या की शुरुआत साल 1913 में बने भूमि संबंधी क़ानून के साथ ही शुरू हो गई थी. यह क़ानून यूनियन ऑफ़ साउथ अफ्रीका के एक ब्रितानी उपनिवेश के तौर पर गठन के तीन साल बाद बना था.

उनका कहना है, "उस क़ानून का मक़सद दक्षिण अफ़्रीका का इस प्रकार विभाजन करना था कि कुछ इलाकों में सिर्फ़ श्वेत संपत्ति के मालिक बन सकें और कुछ जगहों पर केवल काले लोग संपत्ति मालिक रहें."

इसके बाद दक्षिण अफ़्रीका की कुल ज़मीन का केवल सात प्रतिशत हिस्सा काले लोगों के पास रहा. साल 1936 में इसे बढ़ाकर 13 प्रतिशत कर दिया गया जो 1991 तक क़ायम रहा.

दक्षिण अफ़्रीका की प्रेटोरिया यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसर थूला सिंपसन
इमेज कैप्शन, दक्षिण अफ़्रीका की कुल ज़मीन का केवल 13 प्रतिशत हिस्सा काले लोगों के पास है.

थूला सिंपसन का कहना है कि 1913 और 1936 के क़ानूनों के अलावा साल 1923 में बना अर्बन एरियाज़ एक्ट भी महत्वपूर्ण है.

दक्षिण अफ़्रीका की अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए दक्षिण अफ़्रीकी शहरी मज़दूरों की बड़ी ज़रूरत थी, इसलिए उनको ध्यान में रखकर अर्बन एरियाज़ एक्ट बनाया गया.

उस क़ानून के तहत दक्षिण अफ़्रीकी लोग श्वेत लोगों के लिए निर्धारित शहरी इलाकों में काम तो कर सकते थे, लेकिन उनका वहां ज़मीन ख़रीदना या रहना ग़ैरकानूनी था.

थूला सिंपसन का मानना है कि यह सभी क़ानून भूमि असमानता को बढ़ावा देते थे. वहां श्वेत लोगों की आबादी कभी भी 20 प्रतिशत से अधिक नहीं रही है और साल 2025 में दक्षिण अफ़्रीका की कुल आबादी में केवल साढ़े सात प्रतिशत आबादी ही श्वेत है.

मुक्केबाजी करते हुए नेल्सन मंडेला
इमेज कैप्शन, साल 1994 में नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ़्रीका के पहले काले राष्ट्रपति बने.

साल 1948 में दक्षिण अफ़्रीका में नेशनल पार्टी की सरकार बनी. उसने ऐसी नस्लवादी और विभाजनवादी नीतियां अपनाईं, जिससे दक्षिण अफ़्रीका के श्वेत लोगों को फ़ायदा पहुंचा

थूला सिंपसन कहते हैं कि श्वेत और काले लोगों को अलग रखने की नीतियां पहले से चली आ रही थीं लेकिन नेशनल पार्टी ने उन्हें और भी कड़ा कर दिया.

साल 1950 में ग्रूप एरियाज़ एक्ट के तहत काले और श्वेत लोगों के लिए अलग क्षेत्र बनाए गए. इस क़ानून के तहत पहले बहु नस्लीय रहे इलाकों से लगभग 35 लाख काले लोगों को ज़बरदस्ती उनके घरों से बाहर निकाल दिया गया.

नेशनल पार्टी चार दशकों से अधिक समय तक सत्ता में रही और उसके बाद साल 1994 में नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ़्रीका के पहले काले राष्ट्रपति बने.

उनकी पार्टी अफ़्रीकन नेशनल कांग्रेस पार्टी या एएनसी ने देश के पहले ऐसे चुनाव में जीत हासिल की जिसमें देश के सभी नस्ल के लोगों को मतदान का अधिकार मिला था.

अफ़्रीकन नेशनल कांग्रेस पार्टी
इमेज कैप्शन, अफ़्रीकन नेशनल कांग्रेस पार्टी या एएनसी ने देश के पहले ऐसे चुनाव में जीत हासिल की जिसमें देश के सभी नस्ल के लोगों को मतदान का अधिकार मिला था.

थूला सिंपसन ने बताया कि साल 1994 के बाद भूमि असमानता की समस्या से निपटने के लिए एएनसी सरकार ने भूमि पुनर्स्थापन योजना शुरू की.

इसमें और भूमि सुधार कार्यक्रम में फ़र्क है क्योंकि इसके तहत उन लोगों को ज़मीन लौटाई गई जिनकी ज़मीन सरकार ने हड़प ली थी. यह योजना सीमित समय के लिए चलाई गई थी. इसकी मियाद अब ख़त्म हो गई है.

थूला सिंपसन यह भी कहते हैं कि भूमि पुनर्गठन योजना के तहत लोगों के पास विकल्प था कि या वो अपनी ज़मीन वापिस लें या उसके बदले में पैसे लें.

इसमें अधिकांश लोगों ने पैसे लेने का फ़ैसला किया, क्योंकि गांव की ज़मीन के बदले में मिले पैसे से शहर में घर बनाना मुश्किल था. इसके चलते भूमि असमानता की समस्या कायम रही.

अब राष्ट्रपति रामाफ़ोसा का दावा है कि नए कानून की मदद से वो हल निकालने की कोशिश कर रहे हैं.

देश का क़ानून

तनवीर ज़ीवा
इमेज कैप्शन, विश्लेषक कहते हैं कि नए ज़मीन ज़ब्ती क़ानून की आलोचना हो रही क्योंकि अधिकांश लोगों नें इसे ठीक से समझा नहीं है

दक्षिण अफ़्रीका की स्टैलनबॉश यूनिवर्सिटी में संवैधानिक क़ानून की जूनियर लेक्चरर तनवीर ज़ीवा का कहना है कि नए ज़मीन ज़ब्ती क़ानून की आलोचना हो रही क्योंकि अधिकांश लोगों नें इसे ठीक से समझा नहीं है.

तनवीर ज़ीवा कहती हैं हालांकि अभी तक इस क़ानून के तहत कोई ज़मीन ज़ब्त नहीं हुई है और ज़ब्ती की प्रक्रिया भी लंबी होगी.

वो कहती हैं कि आमतौर पर होता यह है कि एक विशिष्ठ मंत्री ज़मीन की निशानदेही करता है. उसके इस्तेमाल का मक़सद तय किया जाता है जिस आधार पर उस ज़मीन को ज़ब्त करना ज़रूरी सिद्ध किया जाता है.

इसके बाद ज़मीन के मालिक को नोटिस भेजा जाता है जिसमें ज़ब्ती के कारण और ज़मीन के इस्तेमाल की जानकारी दी जाती है.

नये क़ानून के लागू होते ही पुराना एक्सप्रोप्रिएशन क़ानून रद्द हो जाएगा.

अफ्रीका में ट्रेन
इमेज कैप्शन, दुनिया के कई देशों में मुआवज़ा देकर रेल, सड़क, अस्पताल या स्कूल बनाने के लिए ज़मीन ली जाती है

तनवीर ज़ीवा बताती हैं कि साल 1975 में अपार्थाइड सरकार द्वारा लागू किए गए ज़मीन ज़ब्ती क़ानून का मक़सद रेल नेटवर्क और दूसरी ढांचागत व्यवस्थाओं के लिए ज़मीन अधिग्रहण करना तो था ही.. साथ ही लोगों को विस्थापित करना भी था.

दुनिया में कई लोकतांत्रिक देशों में भी ज़मीन ज़ब्ती कानून होते हैं. इसके माध्यम से रेल, सड़क, अस्पताल या स्कूल बनाने के लिए ज़मीन ली जाती है और मालिक को मुआवज़ा दिया जाता है.

तनवीर ज़ीवा ने कहा कि, "साल 1925 के अधिग्रहण क़ानून की समस्या यह है कि इसके तहत ज़मीन के मालिकों को मुआवज़ा नहीं मिलेगा."

वह कहती हैं कि कई लोगों में यह चिंता व्याप्त है कि उन्होंने अपार्थाइड शासन के दौरान संपत्ति ख़रीदी थी इसलिए सरकार उनकी संपत्ति कब्ज़ा कर के उसे अश्वेत लोगों को सौंप देगी. मगर ऐसा नहीं है कि किसी ख़ास नस्ल के लोगों की ज़मीन ही ज़ब्त होगी.

घर और खेत
इमेज कैप्शन, खेती की ज़मीन नहीं की जा सकती है ज़ब्त

नए क़ानून के तहत ज़मीन अगर सालों से ख़ाली पड़ी है या प्रापर्टी टैक्स जमा नहीं किया गया है तो वो ज़मीन ज़ब्त की जा सकती है. मगर यह साबित करना पड़ेगा कि वह ज़मीन इस्तेमाल नहीं हो रही थी.

तनवीर ज़ीवा कहती हैं कि बिना सही मुआवज़े के ज़मीन की ज़ब्ती को अदालत में चुनौती दी जा सकती है. खेती की ज़मीन या फिर जिस ज़मीन का इस्तेमाल हो रहा है, उसे ज़ब्त नहीं किया जा सकता है.

तनवीर ज़ीवा ने कहा कि, "लोग इसे जितना कड़ा क़ानून और शक्तिशाली सरकारी हथकंडा समझ रहे हैं उतना शक्तिशाली वह नहीं है. लोग इस क़ानून से डर गए हैं क्योंकि यह एक कड़ा उपाय है और इसी वजह से भूमि सुधार के लिए इसका ज़्यादा इस्तेमाल नहीं हुआ है."

"अभी तक यह भी स्पष्ट नहीं है कि इसे लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति भी है या नहीं. सरकार के पास यह अधिकार साल 1975 के अधिग्रहण क़ानून के तहत भी था, लेकिन उसका ख़ास इस्तेमाल नहीं किया गया."

पेचीदगी

राल्फ़ मथेक्गा
इमेज कैप्शन, राजनीतिक विश्लेषक राल्फ़ मथेक्गा का मानना है कि दक्षिण अफ़्रीका के कई राजनीतिक दल भूमि सुधार के पक्ष में ज़रूर हैं मगर उसके तरीके़ को लेकर उनमें मतभेद हैं

राल्फ़ मथेक्गा राजनीतिक विश्लेषक हैं और दक्षिण अफ्रीका की राजनीति पर किताबें लिख चुके हैं.

उनका मानना है कि दक्षिण अफ़्रीका के कई राजनीतिक दल भूमि सुधार के पक्ष में ज़रूर हैं मगर उसके तरीके को लेकर उनमें मतभेद हैं.

अफ़्रीकन नेशनल कांग्रेस या एएनसी को लगभग तीस सालों तक संसद में बहुमत प्राप्त रहा है लेकिन पिछले साल उसने बहुमत खो दिया. हालांकि एक्सप्रोप्रिएशन बिल उससे पहले ही पारित हो गया था.

फ़िलहाल दक्षिण अफ्रीका में दस दलों की राष्ट्रीय एकता वाली गठबंधन सरकार है. जिसमें डेमोक्रेटिक अलायंस दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है.

राष्ट्रपति सिरील रामाफ़ोसा
इमेज कैप्शन, डेमोक्रेटिक अलायंस ने वेस्टर्न केप उच्च न्यायालय से इस क़ानून को रद्द करने की अपील की है
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डॉक्टर राल्फ़ मथेक्गा ने बताया कि डेमोक्रेटिक अलायंस ने एक्सप्रोप्रिएशन कानून की संवैधानिकता को अदालत में चुनौती दी है. "उसका कहना है कि वो इसके सिद्धांत से असहमत नहीं हैं लेकिन जिस प्रकार यह क़ानून पास हुआ है और लागू किया जा सकता है वो उससे असहमत हैं."

डेमोक्रेटिक अलायंस ने वेस्टर्न केप उच्च न्यायालय से इस क़ानून को रद्द करने की अपील की है. पार्टी ने कहा है कि किसी भी सरकार को ऐसे व्यापक अधिकार नहीं दिए जा सकते कि वो बिना मुआवज़े के निजी संपत्ति ज़ब्त कर ले.

डॉक्टर राल्फ़ मथेक्गा ने कहा कि, "मेरी समझ में नहीं आता कि दक्षिण अफ़्रीका बिना मुआवज़ा दिए निजी संपत्ति ज़ब्त करने की नीति कैसे अपना सकता है. इससे ग़लत संदेश जाएगा. निजी संपत्ति की सुरक्षा अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और यह नीति दक्षिण अफ्रीका के इस सिद्धांत के प्रति कटिबद्धता के ख़िलाफ़ है."

राष्ट्रपति सिरील रामाफ़ोसा की एएनसी पार्टी के भीतर भी एक्सप्रोप्रिएशन क़ानून को लेकर मतभेद हैं.

डॉक्टर राल्फ़ मथेक्गा कहते हैं कि पार्टी के कई नेता भूमि सुधार की प्रक्रिया को इतनी तेज़ी और सख़्ती के साथ लागू करने के पक्ष में नहीं हैं. वो चाहते हैं कि ऐसे विवादास्पद क़ानून को लागू करने से पहले इस मुद्दे से जुड़े सभी पक्षों के साथ सलाह मशवरा किया जाना चाहिए. इस क़ानून को लागू करने में कई समस्याएं आ सकती हैं.

दक्षिण अफ़्रीका के संसाधन
इमेज कैप्शन, अंतरराष्ट्रीय समुदाय की दक्षिण अफ़्रीका के संसाधनों में रुचि है.

डॉक्टर राल्फ़ मथेक्गा ने यह भी कहा कि, "दक्षिण अफ़्रीका में यह तो बहुत सुनने में आता है कि श्वेत लोगों और कई ट्रस्टों के पास बड़ी मात्रा में ज़मीन है लेकिन सच्चाई यह है कि बड़ी मात्रा में ज़मीन तो सरकार के हाथ में है."

"सरकार ऐसी ज़मीन की मालिक है जिसका सही तरीके़ से इस्तेमाल नहीं हो रहा. इससे बिना मुआवज़ा दिये ज़मीन ज़ब्त करने की नीति को लागू करने के सरकार पर सवाल उठ सकते हैं."

इस क़ानून के कई आलोचक मानते हैं कि दक्षिण अफ़्रीका को ज़िम्बाब्वे की भूमि सुधार योजना से सबक सीखना चाहिए.

ज़िम्बाब्वे में 25 साल पहले सरकार द्वारा साढ़े चार हज़ार श्वेत किसानों की ज़मीन पर बिना मुआवज़ा दिए कब्ज़ा करके किसानों और मज़दूरों को बलपूर्वक उनकी संपत्ति से बाहर निकाल दिया था. वह ज़मीनें ज़िम्बाब्वे के दस लाख काले लोगों को सौंप दी गईं.

अब सवाल है कि इस क़ानून ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का इतना ध्यान क्यों आकर्षित किया है?

डॉक्टर राल्फ़ मथेक्गा के अनुसार इसका एक कारण यह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की दक्षिण अफ़्रीका के संसाधनों में रुचि है. "यह मुद्दा निजी संपत्ति की सुरक्षा का है जो व्यापार और पूंजीवाद का महत्वपूर्ण अंग है. अगर इस मुद्दे पर दक्षिण अफ़्रीका की व्यवस्था अस्पष्ट रही तो सवाल ज़रूर उठेंगे."

दक्षिण अफ़्रीका को साबित करना होगा और यह संदेश देना होगा कि वह जो भी कर रहा है वह संवैधानिक लोकतंत्र की सीमाओं के भीतर रहकर ही कर रहा है.

अंतरराष्ट्रीय रुख़

वरिष्ठ शोधकर्ता क्रिस्टोफ़र वैनडोम
इमेज कैप्शन, ज़िम्बाब्वे में 25 साल पहले सरकार द्वारा साढ़े चार हज़ार श्वेत किसानों की ज़मीन पर बिना मुआवज़ा दिए कब्ज़ा करके किसानों और मज़दूरों को बलपूर्वक उनकी संपत्ति से बाहर निकाल दिया गया था.

चैटहम हाउस में अफ़्रीका प्रोग्राम के वरिष्ठ शोधकर्ता क्रिस्टोफ़र वैनडोम की राय है कि दक्षिण अफ़्रीका के नए एक्सप्रोप्रिएशन क़ानून की वजह से उसके अंतरराष्ट्रीय समुदाय और ख़ासतौर पर अमेरिका के साथ संबंध प्रभावित हो सकते हैं. फ़रवरी में राष्ट्रपति ट्रंप ने दक्षिण अफ़्रीका को दी जाने वाली आर्थिक सहायता रोक दी है.

क्रिस्टोफ़र वैनडोम ने कहा कि वैसे तो अमेरिका से दक्षिण अफ़्रीका को बड़ी आर्थिक सहायता नहीं मिलती है लेकिन एचआइवी और एड्स नियंत्रण योजना के लिए खर्च होने वाले धन का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका के पेपफ़ार कोष से आता था. पेपफ़ार, अमेरिका द्वारा विश्व में एचआइवी और एड्स को रोकने के लिए चलाई जा रही योजना है.

क्रिस्टोफ़र वैनडोम ने कहा कि, " यहां एक महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि अमेरिका ने यह क़दम एक्सप्रोप्रिएशन क़ानून की वजह से उठाया है या वह दक्षिण अफ़्रीका की अन्य अंतरराष्ट्रीय कार्यवाहियों से नाराज़ है? जिस प्रकार दक्षिण अफ़्रीका अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में एक मुकदमे को लेकर प्रयास कर रहा है क्या वो अमेरिका की नाराज़गी का कारण है?"

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय संयुक्त राष्ट्र का सर्वोच्च न्यायालय है जो देशों के बीच विवाद का निपटारा करता है. दिसंबर 2023 में दक्षिण अफ़्रीका ने इस न्यायालय में इसराइल क़े ख़िलाफ़ मुक़दमा दायर किया जिसमें उसने इसराइल पर गज़ा में फ़लस्तीनियों के जनसंहार का आरोप लगाया.

राष्ट्रपति ट्रंप
इमेज कैप्शन, राष्ट्रपति ट्रंप इस क़ानून को लेकर दक्षिण अफ़्रीका से ख़फ़ा भी हैं.

राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा जारी किए गए आदेश में दावा किया गया है कि दक्षिण अफ़्रीका एक्सप्रोप्रिएशन कानून की सहायता से अल्पसंख्यक श्वेत किसानों के खेत बिना मुआवज़ा दिए ज़ब्त कर सकता है.

राष्ट्रपति ट्रंप इस क़ानून को लेकर दक्षिण अफ़्रीका से ख़फ़ा भी हैं.

क्रिस्टोफ़र वैनडोम के अनुसार यूरोपीय देशों सहित कई अन्य देशों ने इस कानून और इसके मक़्सद को बेहतर तरीके से समझा है.

ख़ास तौर पर जर्मनी में कई वेबसाइट पर कहा जा रहा है कि इस कानून की संवैधानिकता में कोई मसला नहीं है और अमेरिका के दावे के विपरित इस कानून से बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा बल्कि फ़ायदा होगा.

दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति रामाफ़ोसा ने कहा है कि वो विभिन्न देशों में दूत भेज कर इस मुद्दे पर देश की नीति को समझाएंगे. मगर दक्षिण अफ़्रीका में भूमिसुधार कार्यक्रम में इस नए कानून से क्या फ़ायदा होगा?

क्रिस्टोफ़र वैनडोम ने कहा कि, "यह कानून पहले से मौजूद भूमिसुधार कानून जैसे अन्य कानूनों के साथ मिल कर लागू होगा. यह कानून ज़मीन ज़ब्ती में आने वाली कुछ कानूनी बाधाओं को दूर कर सकता है.

हालांकि अभी तक बिना मुआवज़े के कोई ज़मीन ज़ब्त नहीं की गई है. यह कानून एक संदेश देता है. लेकिन यह भूमिसुधार कार्यक्रम में तेज़ी लाने का रामबाण उपाय नहीं है. यह एक कानूनी प्रावधान है जिसके तहत ख़ाली पड़ी ज़मीन की ज़ब्ती हो सकती है."

तो क्या दक्षिण अफ़्रीका भूमि असमानता का हल निकाल सकता है? भूमिसुधार कार्यक्रम कई दशकों से भिन्न राजनीतिक और सामाजिक पेचिदगियों में फंसा हुआ है.

नया एक्सप्रोप्रिएशन कानून भूमि वितरण में मदद कर सकता है लेकिन केवल उसके बल पर भूमि असमानता की समस्या हल नहीं हो सकती.

ज़मीन के मालिकाना हक़ में संतुलन लाने की प्रक्रिया धीमी रही है और अब एएनसी पार्टी को मिलने वाला जनसमर्थन भी घट गया है ऐसे में भूमिसुधार का रास्ता आसान नहीं होगा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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