चिराग पासवान बिहार सरकार को 'निकम्मा' और ख़ुद को 'शर्मिंदा' बताकर क्या हासिल करना चाहते हैं?

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी न्यूज़ संवाददाता
- प्रकाशित
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हाल ही में केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (आर) प्रमुख चिराग पासवान ने एक न्यूज़ पोर्टल से बातचीत में बिहार की कानून व्यवस्था पर सवाल उठाए.
उनका कहना था, "मुझे शर्म आती है कि मैं ऐसी सरकार के साथ हूं, जहां पर ऐसी घटनाएं हो रही हैं. बिहार में आज की तारीख़ में कोई सुरक्षित नहीं है."
चिराग ने बिहार के प्रशासन को 'निकम्मा' बताया और कहा, "इनके बस में बिहार के लोगों को सुरक्षित रखना नहीं है. मुझे शर्म आती है कि मैं ऐसी सरकार का समर्थन कर रहा हूं."
राज्य में हाल ही में लड़कियों के साथ यौन हिंसा से जुड़े कई वीडियो वायरल हुए हैं. ऐसा ही एक वीडियो जमुई लोकसभा क्षेत्र का भी था जहां से चिराग पासवान पहले खुद सांसद रहे हैं और फिलहाल उनके जीजा अरुण भारती इस सीट से सांसद हैं.
चिराग पासवान के इस बयान के बाद कई सवाल उठे हैं, जिनमें से सबसे अहम है कि क्या चिराग एनडीए से अलग हो सकते हैं? क्या इन बयानों के जरिए चिराग आगामी यूपी और पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए दांव साध रहे हैं? या फिर ये बयान सम्राट चौधरी के विवादित बयान के बीच एक युवा नेता के तौर पर ख़ुद की मज़बूत पोजिशनिंग की कोशिश है?
पहले भी दिया है ऐसा बयान
ये पहली बार नहीं है जब चिराग ने अपनी ही सरकार पर सवाल उठाए हों.
जुलाई 2025 में पटना के बड़े कारोबारी गोपाल खेमका की गांधी मैदान के पास हत्या कर दी गई थी.
उसके बाद भी चिराग पासवान ने कानून व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए पत्रकारों से कहा था, "इस सवाल से भागने का प्रयास ना मैं करूंगा, ना हमारी सरकार को करना चाहिए. ये चिंता का विषय है कि शहरी इलाक़े में इस तरह से खुलेआम इतनी बड़ी घटना को अंजाम दिया जाता है, जहां थाना बगल में है और बड़े-बड़े अधिकारी पास रहते हैं."
यानी चिराग ने ये बयान बिहार विधानसभा चुनाव से कुछ महीनों पहले दिया था. इस बयान को उनकी दबाव की राजनीति माना गया था ताकि वो विधानसभा चुनाव में ज्यादा सीट ले सकें.
हुआ भी यही. साल 2025 के विधानसभा चुनाव में लोजपा (आर) को 29 सीटें मिलीं और पार्टी ने बढ़िया प्रदर्शन करते हुए 19 सीटों पर जीत हासिल की.
क्या इस बार भी चिराग बिहार की कानून व्यवस्था के कंधे पर बंदूक रखकर यूपी और पंजाब के चुनाव को लक्ष्य कर रहे हैं?
दलित चौपाल से चाणक्य चौपाल तक

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यूपी चुनाव को लेकर चिराग पासवान ने कहा है, "पार्टी यूपी में चुनाव लड़ेगी. गठबंधन का स्वरूप क्या होगा, ये तय होना बाकी है. लेकिन हमारी तैयारी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने की है. गठबंधन हुआ तो ठीक, वरना हम अकेले चुनाव लड़ेंगे."
लोजपा (आर) को लगातार कवर कर रहीं पत्रकार दक्षा प्रिया कहती हैं, "पार्टी यूपी और पंजाब का चुनाव बीजेपी के साथ लड़ना चाहती है. इसके लिए जमुई से सांसद अरुण भारती लगातार सक्रिय हैं. चिराग का बिहार की कानून व्यवस्था या यूपी में 403 सीट लड़ने को लेकर दिया बयान उनकी प्रेशर पॉलिटिक्स का हिस्सा लगता है. वो बीजेपी का साथ छोड़कर कहीं नहीं जाने वाले. बिहार चुनाव से पहले भी वो कई ऐसे बयान देते थे."
बता दें कि अरुण भारती जमुई से सांसद हैं और बिहार, उत्तरप्रदेश, झारखंड में पार्टी के प्रभारी हैं. उन्हें पंजाब में चुनाव प्रभारी भी बनाया गया है

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पंजाब प्रभारी बनने के बाद अरुण भारती ने सप्ताह भर पहले पटना में पत्रकारों से कहा, हम लोग उत्तर प्रदेश और पंजाब में मजबूत तैयारी कर रहे हैं और दोनों ही जगह हमारी बड़ी उप स्थिति दर्ज होगी.
वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शर्मा बताते हैं, "पार्टी बिहार से सटे यूपी के इलाकों में और बिजनौर से चुनाव लड़ना चाहती है. बिजनौर से कभी रामविलास पासवान ने भी चुनाव लड़ा था. अभी तक तो यही लग रहा है कि पार्टी एनडीए के फोल्ड में रहकर ही चुनाव लड़ेगी. चिराग यूपी की दलित पॉलिटिक्स में अपनी जगह बनाना चाहते हैं, लेकिन देखना होगा कि वो क्या कर पाते हैं."
बीते कुछ समय में अगर लोजपा (आर) की यूपी में गतिविधि देखें तो पार्टी ने दलित चौपाल से लेकर चाणक्य चौपाल तक आयोजित की है. इंटर के छात्र-छात्राओं के साथ भी पार्टी ने संवाद कार्यक्रम आयोजित किए. वहीं, 27 सितंबर को प्रयागराज के परेड ग्राउंड में 'यूथ बोले तो' नाम का कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें युवाओं से चिराग बात करते हैं.
इन सभी कार्यक्रमों के आयोजन में चिराग के बाद अरुण भारती ही पार्टी का दूसरा सबसे अहम चेहरा बनकर उभरे.
दक्षा प्रिया बीबीसी से कहती हैं, "चिराग पासवान दिल्ली की पॉलिटिक्स में सक्रिय हैं, ऐसे में यहां अरुण भारती पार्टी को सांगठनिक तौर पर आकार दे रहे हैं. लेकिन इस प्रक्रिया में कई पुराने चेहरे साइडलाइन हो रहे हैं और नए चेहरे जो अरुण भारती की गुडबुक में हैं, उनको ज़िम्मेदारियां मिल रही हैं."
यूथ बोले तो....

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'बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट' का नारा देने वाले चिराग पासवान खुद को यूथ आइकॉन के तौर पर भी स्थापित करने की कोशिश करते रहते हैं. यही वजह है कि पार्टी ने 24 सितंबर से 'यूथ बोले तो' कार्यक्रम की शुरुआत की है. ये शुरुआत पटना से हुई थी और इसका खाका बहुत हद तक कांग्रेस नेता राहुल गांधी के कार्यक्रम छात्रों की गूंज जैसा ही है.
हाल ही में जब पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा हुई तो चिराग पासवान ने कहा था, "हमने बड़े बदलाव किए हैं. अलग-अलग राज्यों में चुनाव होने हैं और चुनावों को प्राथमिकता देते हुए महिलाओं और युवाओं को कार्यकारिणी में जगह दे रहे हैं. ये युवा चेहरे अनुभवी लोगों के साथ काम करेंगे."
स्पष्ट है कि चिराग का फोकस युवा आबादी पर है.
बिहार की राजनीति जिसमें लालू-नीतीश और रामविलास पासवान के युग का अंत हो चुका है, वहां चिराग इसी युवा के सहारे अपनी राजनीति की गाड़ी को सरपट भगाना चाहते हैं.
'चिराग, रामविलास पासवान से बड़े मौसम विज्ञानी'

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लोजपा (आर) की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा के बाद पार्टी ने चिराग को राज्य का मुख्यमंत्री बनाने का संकल्प दोहराया.
चिराग पासवान, अपने पिता रामविलास पासवान की केंद्र की राजनीति से इतर स्टेट की राजनीति करना चाहते हैं.
पत्रकार अरविंद शर्मा कहते हैं, "चिराग नई पीढ़ी के नेता हैं. उनके साथ मुश्किल ये है कि वो सरकार में बने भी रहना चाहते हैं और नई पीढ़ी के नेता भी बनना चाहते हैं. ये भी साफ़ है कि वो सरकार के हिसाब से चलेंगे तो नई पीढ़ी के नेता नहीं बन पाएंगे, इसलिए वो ऐसे बयान देते रहते हैं. उनके लिए करो या मरो की स्थिति है क्योंकि अभी अगर उन्होंने नहीं किया तो वो एक सामान्य नेता बनकर रह जाएंगे."
अरविंद शर्मा कहते हैं, "लेकिन चिराग विपरीत परिस्थितियों में भी बने रहना जानते हैं. वो रामविलास पासवान से भी बड़े मौसम विज्ञानी हैं. उनको बेघर किया गया, परिवार टूटा, पार्टी टूटी लेकिन उन्होंने खुद को मोदी का हनुमान बने रहने दिया. अभी जब बीजेपी बैकफुट पर है तो चिराग उसका फ़ायदा उठाना चाहते हैं. अभी उनके दो ही लक्ष्य हैं यूपी-पंजाब का चुनाव और साल 2030 में बिहार चुनाव में अपने लिए बड़ी भूमिका."
क्या चिराग अपने विभाग से नाखुश हैं?
लेकिन क्या चिराग की ये प्रेशर पॉलिटिक्स लंबे समय तक चल पाएगी?
इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार फ़ैज़ान अहमद कहते हैं, " चिराग के मुंह से बार-बार अपनी ही सरकार की आलोचना सुनना हास्यास्पद है. वो पब्लिक स्पेस में आकर पब्लिक कन्जम्पशन के लिए ऐसे बयान देते हैं. उनके बयानों में गंभीरता और ईमानदारी का अभाव है जो राजनीति में उनकी अपरिपक्वता को दिखाता है. अगर उन्हें बिहार की कानून व्यवस्था से दिक्कत है तो वो इस मुद्दे को पीएम, गृह मंत्री के सामने भी उठा सकते हैं."
चिराग के बयान पर चुटकी लेते हुए आरजेडी नेता रोहिणी आचार्य ने कहा, "इस्तीफ़ा देने के लिए किस शुभ मुहूर्त का इंतज़ार कर रहे हैं चिराग पासवान जी?"
वहीं जेडीयू नेता लेसी सिंह ने कहा, "चिराग एनडीए के बड़े नेता है. उन पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकते. लेकिन जो घटनाएं (महिला हिंसा) हुई है वो किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं है."
चिराग पासवान के कामकाज के तरीकों और उनके बयानों की आलोचना ख़ुद उनकी पार्टी के भीतर भी है.
पार्टी के एक नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "उनका यूथ बोले तो कार्यक्रम प्लान्ड था जिसमें पांच चुने हुए युवाओं से चिराग पासवान को बात करनी थी. चिराग पासवान के मंच पर तो युवा थे लेकिन मंच के नीचे रैली की तरह भीड़ जुटाई गई थी जिसमें युवा बहुत कम थे. यूपी-पंजाब का इलेक्शन चिराग लड़ना चाहते हैं और साथ ही अपना पोर्टफ़ोलियो यानी खाद्य प्रसंस्करण को वो बदलवाना चाहते हैं. उनको लगता है कि उन्हें कोई दूसरा महत्वपूर्ण विभाग मिलना चाहिए."
चिराग, पीके और कांग्रेस
चिराग की राजनीति आगे किस ओर जा सकती है?
इस सवाल पर पत्रकार अरविंद शर्मा कहते हैं, "चिराग जानते हैं कि बिहार में सवर्ण नेता का स्कोप नहीं है. यहां ओबीसी और दलित नेता का स्कोप है. तेजस्वी ने ओबीसी नेता के तौर पर बिहार की राजनीति का एक सिरा पकड़ा हुआ है. उसका दूसरा सिरा चिराग पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं."
वो कहते हैं, "मेरा अनुमान है कि लोकसभा चुनाव तो चिराग एनडीए में रहकर ही लड़ेंगे लेकिन साल 2030 का बिहार चुनाव वो नए गठबंधन बनाकर लड़ेंगे जिसमें प्रशांत किशोर, कांग्रेस और चिराग होंगे. प्रशांत किशोर और चिराग एक दूसरे के ख़िलाफ़ बयानबाजी नहीं करते हैं. वहीं, विधानसभा चुनाव में हार के बाद प्रशांत किशोर और प्रियंका गांधी की मुलाकात भी महत्वपूर्ण है."
इस बीच भरत तिवारी एनकाउंटर और महिला हिंसा से जुड़े वायरल वीडियो पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के बयानों ने उनके प्रति नाराज़गी बढ़ा दी है. जिसके चलते सत्ता पक्ष और विपक्षी पार्टियां बिहार की राजनीति पर नज़र रखे हुए हैं. चिराग पासवान भी उनमें से एक हैं, जो हर बदलती राजनीतिक परिस्थिति का फ़ायदा उठाना चाहेंगे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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