ट्रंप के फ़ैसले से डेडलाइन के ठीक पहले भारत को बड़ी राहत, अमेरिका में बढ़ सकता है विरोध

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए रूस पर लगाए जाने वाले कई प्रतिबंधों को रोक दिया है.
इन प्रतिबंधों को हाल ही में अमेरिकी कांग्रेस ने यूक्रेन के ख़िलाफ़ रूस के युद्ध के लिए उसे दंडित करने के मक़सद से मंजूरी दी थी.
इस क़ानून के तहत ट्रंप को रूस से कच्चा तेल ख़रीदने वाले पाँच सबसे बड़े देशों से आने वाले सभी सामानों पर 100 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाने के लिए 30 दिन का समय दिया गया था.
इसमें रूस की कई संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाने और अमेरिका में रूस के ऊर्जा उत्पादों के सभी आयात पर 500 फ़ीसदी टैरिफ लगाने का प्रावधान भी था. इन प्रावधानों को लागू करने की एक महीने की समयसीमा 18 अक्टूबर को समाप्त होने वाली थी.
कहा जा रहा है कि इस क़ानून को लागू करने से छूट देकर ट्रंप ने रूस के ऊर्जा उत्पादों के सबसे बड़े ख़रीदारों चीन, भारत और तुर्की के साथ संभावित टकराव से भी बचने की कोशिश की है.
शुक्रवार रात जारी एक कार्यकारी आदेश में ट्रंप ने कहा कि कुछ प्रतिबंधों को रोकना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है. ट्रंप ने सितंबर में प्रतिबंधों से जुड़े बिल पर हस्ताक्षर कर उसे क़ानून बनाया था और ये प्रतिबंध रविवार से लागू होने वाले थे.
यह घटनाक्रम ट्रंप के उस बयान के कुछ दिनों बाद आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि नवंबर में होने वाले मिटडर्म इलेक्शन से पहले अमेरिका में ऊर्जा की क़ीमतें कम करने के लिए अमेरिका रूस से डीज़ल आयात करेगा. इन चुनावों से तय होगा कि कांग्रेस में किस पार्टी का नियंत्रण रहेगा.
इस योजना ने सांसदों को चौंका दिया है और इसके ख़िलाफ़ दोनों प्रमुख पार्टियों के सांसदों ने विरोध जताया है.

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भारत को बड़ी राहत
भारत के लिए इस क़ानून को एक धमकी के तौर पर देखा जा रहा था. इससे ट्रंप का दबाव बनाने का प्रभाव बढ़ा था, ख़ासकर ऐसे समय में जब वह रूस के साथ व्यापारिक समझौतों की संभावनाएं भी तलाश रहे हैं.
ट्रंप के इस फ़ैसले पर प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू की डिप्लोमैटिक अफेयर्स एडिटर सुहासिनी हैदर ने लिखा है, ''2019 और नवंबर 2025 से फ़रवरी 2026 के बीच के दौर के उलट, भारत ने साफ़ कर दिया कि वह अमेरिका के नए प्रतिबंध क़ानून की वजह से रूस से तेल खरीदना बंद नहीं करेगा. अपनी सीमाएं स्पष्ट करना और उन पर दृढ़ रहना काम आता है.''
अगस्त 2026 तक भारत, चीन के बाद रूसी तेल का दूसरा सबसे बड़ा ख़रीदार था. ऐसे में संभावित अमेरिकी टैरिफ़ का सबसे ज़्यादा असर इन दोनों एशियाई देशों पर पड़ सकता है.
दिसंबर 2022 से अगस्त 2026 के बीच रूस के कुल कच्चे तेल निर्यात में चीन की हिस्सेदारी 50 फ़ीसदी जबकि भारत की हिस्सेदारी 37 फ़ीसदी थी.
भारत के विदेश मंत्रालय ने बिल पास होने के बाद तुरंत बयान जारी किया था. मंत्रालय ने कहा कि उसने अमेरिका के समक्ष इस मुद्दे को उठाया है और इस बात पर ज़ोर दिया है कि इसका असर न केवल द्विपक्षीय संबंधों, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाज़ार पर भी पड़ सकता है.
जुलाई 2026 के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारत के कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 51 फ़ीसदी से अधिक थी. ऐसे समय में जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से होकर तेल की आवाजाही बाधित है, 30 दिनों के भीतर रूसी तेल पर निर्भरता को बड़े पैमाने पर कम करना भारत के लिए मुश्किल हो सकता है.
अगर कोई अमेरिकी आयातक भारत से 20 डॉलर का कपड़ा ख़रीदता है, तो 100 फ़ीसदी टैरिफ़ से सीमा पर ही 20 डॉलर का अतिरिक्त शुल्क लगता.
इसके बाद घरेलू परिवहन, खुदरा मार्जिन और अन्य टैक्ट भी जुड़ते. अगर वही उत्पाद किसी दूसरे देश से काफ़ी कम टैरिफ़ पर मिल सकता है, तो भारत से महंगा सामान ख़रीदने का कोई कारण नहीं रहता.
भारत अमेरिका से अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है लेकिन यह इतना आसान नहीं है.
कहा जा रहा है कि फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट अमेरिकी बाज़ार की जगह नहीं ले सकते. लेकिन वे दूसरे बड़े बाज़ारों में प्रवेश की लागत कम कर सकते हैं.
सिर्फ़ टैरिफ़ में रियायतें इन बाज़ारों तक पहुँच सुनिश्चित नहीं करेंगी. भारतीय निर्यातकों को लॉजिस्टिक्स में निवेश करना होगा, तकनीकी और उत्पाद मानकों को पूरा करना होगा, अपने डिजाइन में बदलाव करना होगा और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क तैयार करने होंगे. यही वे क्षमताएं हैं, जिन्होंने उन्हें अमेरिकी बाज़ार में अपनी जगह बनाने में मदद की.
विशेषज्ञों का कहना है कि निर्यात बाज़ारों में विविधता लाने की भी एक सीमा है. अगर कोई कंपनी अमेरिका पर अपनी 60 फ़ीसदी निर्भरता घटाकर यूरोप पर 60 फ़ीसदी निर्भर हो जाती है, तो भौगोलिक रूप से तो उसने विविधता लाई है, लेकिन रणनीतिक रूप से नहीं. बाज़ारों में विविधता के साथ-साथ ग्राहकों के आधार को भी व्यापक बनाना होगा.'

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अमेरिका में बढ़ेगा विरोध
अमेरिका के प्रतिबंध क़ानून का नाम दक्षिण कैरोलाइना के दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर रखा गया है. 11 जुलाई को निधन से पहले वह वॉशिंगटन में यूक्रेन के सबसे मुखर समर्थकों में से एक थे.
इस क़ानून का निशाना रूसी अर्थव्यवस्था है. इसके तहत ट्रंप को रूस से तेल और गैस ख़रीदने वाले पांच सबसे बड़े देशों पर 100 फ़ीसदी तक टैरिफ लगाने के व्यापक अधिकार दिए गए हैं. इनमें ख़ास तौर पर चीन और भारत शामिल हैं.
इसके अलावा, इस क़ानून में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, रूसी सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों, बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों के साथ-साथ रूस के उस 'शैडो फ्लीट' पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है, जिसमें शामिल टैंकरों का इस्तेमाल मौजूदा प्रतिबंधों से बचने के लिए किया जाता है.
गुरुवार को अमेरिकी सांसदों के दोनों प्रमुख दलों के 20 सदस्यों के एक समूह ने ट्रंप को पत्र लिखकर नए क़ानून का पालन करने की अपील की. यह क़ानून 18 अक्टूबर से लागू होने वाला था.
पिछले सप्ताह ट्रंप ने घोषणा की थी कि उन्होंने पुतिन से फोन पर बातचीत की है और मॉस्को से डीज़ल ख़रीदने पर सहमति जताई है.
अमेरिका के सहयोगी देशों ने इस क़दम की आलोचना की. उन्हें आशंका है कि इससे यूक्रेन के ख़िलाफ़ युद्ध में रूस को मदद मिल सकती है.
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने इस समझौते को पुतिन के लिए एक तोहफ़ा बताया. उन्होंने कहा कि यह "ऐसे युद्ध में निवेश है, जिसे ख़त्म किया जाना चाहिए".

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यूक्रेन की बढ़ेंगी मुश्किलें
सीनेट की बैंकिंग समिति में शीर्ष डेमोक्रेटिक सदस्य एलिजाबेथ वॉरेन ने कहा, "इन प्रतिबंधों से छूट देकर ट्रंप कांग्रेस के उस निर्देश की अवहेलना कर रहे हैं, जिसमें रूस पर दबाव बढ़ाने की बात कही गई थी. इससे व्लादिमीर पुतिन को अपना आक्रामक युद्ध जारी रखने में मदद मिल रही है."
रूस पर प्रतिबंध नहीं लगाने का यह फ़ैसला ऐसे समय आया है, जब अमेरिका और यूक्रेन के बीच संबंध एक बार फिर तनावपूर्ण हो गए हैं.
ट्रंप ने ज़ेलेंस्की पर रूस की तेल रिफाइनरियों पर हमले रोकने के लिए काफ़ी दबाव डाला है. वहीं, रूस ने यूक्रेन में नागरिक और ऊर्जा ढांचे पर बमबारी जारी रखी है. पिछले एक सप्ताह में इन हमलों में 100 से अधिक नागरिकों की मौत हुई है.
ब्रिटिश अख़बार फ़ाइनैंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, यूक्रेन को अपने विदेशी साझेदारों से आने वाले मिसाइल हमलों के बारे में ख़ुफ़िया जानकारी मिलने में बिना किसी स्पष्ट वजह के रुकावटों का सामना करना पड़ा है. इसके अलावा, यूक्रेन की ड्रोन यूनिट्स की ओर से इस्तेमाल की जाने वाली एलन मस्क की स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं पर भी पाबंदियां लगाई गई हैं.
ट्रंप ने इस बात से इनकार किया है कि अमेरिका ने यूक्रेन के साथ ख़ुफ़िया जानकारी साझा करना बंद कर दिया है.
पिछले सप्ताह मियामी में हुई बातचीत के दौरान अमेरिकी अधिकारियों ने यूक्रेन को चेतावनी दी थी कि अगर उसने रूस की तेल रिफाइनरियों पर हमले नहीं रोके, तो अमेरिका उसके साथ महत्वपूर्ण ख़ुफ़िया जानकारी साझा करना बंद कर सकता है.
इस सप्ताह फाइनेंशियल टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में ज़ेलेंस्की ने कड़ा रुख़ अपनाया. उन्होंने कहा कि रूस की ओर से यूक्रेन पर लगातार हो रही बमबारी को देखते हुए वह रूसी तेल रिफ़ाइनरियों पर हमले फिर शुरू करेंगे.
उन्होंने मॉस्को के साथ कारोबारी समझौते करने की वॉशिंगटन की उत्सुकता और पुतिन के प्रति ट्रंप के स्पष्ट प्रशंसा भाव की भी कड़ी आलोचना की.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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