अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आज़ादी की लड़ाई में ग़दरियों का ईरान से क्या था कनेक्शन

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- Author, अवतार सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
ईरान–अमेरिका युद्ध के दौरान भारत के कई वर्गों, विशेष रूप से किसानों, सिखों और मुसलमानों ने ईरान के प्रति काफ़ी सहानुभूति जताई थी.
जहां भारतीय जनता का ईरानी संस्कृति और साहित्य के साथ एक साझा रिश्ता रहा है, वहीं भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ईरान कई भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों और ग़दरियों (ग़दर लहर में शामिल लोग) का भी ठिकाना रहा.
ईरान पहुंचने वाले भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के शुरुआती नामों में भगत सिंह के चाचा और पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन के नेता अजीत सिंह, और सूफ़ी अम्बा प्रसाद के नाम शामिल हैं.
उनके बाद, ग़दरी डॉक्टर पीएस खानखोजे और उनके साथियों के भी ज़िक्र मिलते हैं, जो 'ईरान में रहते हुए जर्मनी की मदद से' ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे.
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देश भगत यादगार कमेटी, जालंधर द्वारा प्रकाशित लेखक गुरचरण सिंह सहनसरा की क़िताब 'हिस्ट्री ऑफ़ द ग़दर पार्टी' के अनुसार, ग़दर कार्यकर्ता इराक़ और ईरान से मोर्चे में 'कूद गए'.
ईरान कनेक्शन

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अजीत सिंह 1907 में ब्रिटिश सरकार द्वारा लाए गए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ लड़ने वाले किसान आंदोलन के एक प्रमुख नेता थे.
लुधियाना में आर्य कॉलेज के पूर्व प्रोफ़ेसर पीएस भोगल कहते हैं कि उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद शहर के रहने वाले अम्बा प्रसाद 1907 में जेल से रिहा होने के बाद लाहौर गए और किसान आंदोलन में शामिल हो गए.
अपनी आत्मकथा 'बरीड अलाइव' में अजीत सिंह लिखते हैं, "मैं 1908 में सूफ़ी अम्बा प्रसाद और तीन अन्य लोगों के साथ भारत से फ़ारस (अब ईरान) चला गया. उस समय देश छोड़ने के लिए पासपोर्ट की कोई ज़रूरत नहीं होती थी. हमने कराची से आसानी से एक जहाज़ पकड़ा, जो बुशहर के लिए रवाना हुआ. यह फ़ारसी क्रांति का समय था."
'व्हेन टू स्ट्रीम्स मैट' क़िताब के लेखकों में से एक भरत डोगरा कहते हैं कि सूफ़ी अम्बा प्रसाद हिंदू–मुस्लिम एकता के समर्थक थे और अक्सर अजीत सिंह के घर आते-जाते रहते थे.
लेकिन जब भारत में दोनों के लिए काम करना बहुत कठिन हो गया और गिरफ़्तारी का डर पैदा हो गया, तो वे दोनों ईरान चले गए, जहां उन्होंने निर्वासन में अपना काम जारी रखा.
वह कहते हैं कि जब अजीत सिंह को तुर्की जाना पड़ा, तो ईरान में ज़्यादातर काम अम्बा प्रसाद के कंधों पर आ गया.
उस समय ब्रिटिश भी ईरान पर अपनी पकड़ मज़बूत कर रहे थे. अम्बा प्रसाद ने ईरान में निर्वासन के दौरान एक अख़बार भी निकालना शुरू किया था.
ईरान और बलूचिस्तान से हमले की तैयारी

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कनाडा और अमेरिका में रहने वाले भारतीय प्रवासियों ने 1913 में ग़दर पार्टी का गठन किया.
ग़दर पार्टी एक राजनीतिक दल था, जिसने साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ हथियारबंद संघर्ष की घोषणा की और भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की. इसके संस्थापक सोहन सिंह भकना थे. पार्टी का मुख्यालय सैन फ़्रांसिस्को में था.
क़िताब 'हिस्ट्री ऑफ़ द ग़दर पार्टी' के अनुसार, ग़दर पार्टी ने डॉक्टर खानखोजे, बिशन दास कोच्छड़ नूरमहल, किदार नाथहरियाणा (होशियारपुर ज़िला), भाई बसंत सिंह चोंदा (पटियाला), भाई हरनाम सिंह, ऋषि केश लट्ठा (महाराष्ट्र) और अमीन चौधरी (बंगाल) को मेसोपोटामिया (इराक़) और ईरान में काम करने के लिए भेजा था.
"ये ग़दरी यूनान के रास्ते कॉन्स्टैन्टिनोपल (वर्तमान इस्तांबुल) पहुंचे और भारतीय समिति की कमान में मेसोपोटामिया और ईरान के मोर्चों में कूद पड़े."
पूर्व प्रोफ़ेसर हरीश पुरी अपनी क़िताब 'ग़दर मूवमेंट: ए शॉर्ट हिस्ट्री' में लिखते हैं कि डॉक्टर खानखोजे ने अपनी स्मृतियों में लिखा है कि ग़दर आंदोलन के क्रांतिकारियों ने भारत में ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ बाहर से हमला शुरू करने की एक योजना बनाई थी.
पुरी लिखते हैं, "खानखोजे, जिन्होंने अमेरिका में सैन्य शिक्षा प्राप्त की थी, ने ईरान (फ़ारस) और बलूचिस्तान के ज़रिये भारत में प्रवेश करने और युद्ध शुरू करने की योजना बनाई."
राजनीति विज्ञान के सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर पीएस भोगल कहते हैं कि इस समय प्रथम विश्व युद्ध शुरू हो रहा था और ग़दरियों ने जर्मनी से मदद लेने के बारे में सोचा था.

जर्मनी से मिली मदद पर हाल ही में प्रकाशित क़िताब 'ग़दर मूवमेंट, ए फ़ॉरगॉटन स्ट्रगल' में राणा प्रीत गिल लिखते हैं, "पहला जत्था, जिसमें पंद्रह लोग शामिल थे और जिसका नेतृत्व विल्हेल्म वासमुस कर रहे थे, 6 सितंबर 1914 को बर्लिन से तुर्की के लिए रवाना हुआ."
वह आगे लिखते हैं, "उन दिनों ईरान का रणनीतिक महत्व काफ़ी ज़्यादा था, क्योंकि उसके क्षेत्र से गुज़रे बिना कोई भी अभियान पूरा नहीं किया जा सकता था, क्योंकि गोला-बारूद को हवा में नहीं फेंका जा सकता था और यहां तक कि मिलिशिया (नागरिकों के सशस्त्र समूह, जो पेशेवर सेनाएं नहीं थीं) वायरलेस रेडियो जैसी आधुनिक तकनीकों के विशेषज्ञ नहीं थे."
"लेकिन ईरान अंग्रेज़ों और रूसियों से सशंकित था. उनके और तुर्कों के बीच मित्रता नहीं थी. लेकिन जर्मनों के प्रति उनका रवैया सहानुभूतिपूर्ण था. डेमोक्रेटिक पार्टी और कुछ क़बीलाई सरदारों को जर्मनों से सहानुभूति थी."
राणा गिल आगे लिखते हैं, "जब वासमुस का मिशन चल रहा था, तब जर्मनों ने कैप्टन ऑस्कर फ़ॉन नीडरमायर के नेतृत्व में काबुल के लिए एक दूसरा मिशन भेजा. इस मिशन का मुख्य उद्देश्य अफ़ग़ानिस्तान के अमीर को भारत पर हमला करने के लिए राज़ी करना था."
"यह मिशन 5 दिसंबर 1914 को इस्तांबुल से रवाना हुआ और अलेप्पो में वासमुस से मिला. वहाँ से दोनों साथ मिलकर बग़दाद की ओर बढ़े और जनवरी 1915 के मध्य में वहां पहुंचे."
आज़ादी का सपना और निराशा

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क़िताब 'हिस्ट्री ऑफ़ द ग़दर पार्टी' में दिए गए संदर्भों के अनुसार, ग़दरियों की रणनीति यह थी कि स्थानीय ब्रिटिश-समर्थक सरकार के ख़िलाफ़ ईरानी जनता को खड़ा कर बलूचिस्तान की ओर बढ़ा जाए.
बलूचिस्तान से विद्रोह को आगे पंजाब तक फैलाया जाना था. बग़दाद, बसरा और बुशेहर में ग़दरियों ने ब्रिटिश सेना के हिंदी सैनिकों के बीच विद्रोह के लिए प्रचार शुरू किया.
सहनसरा आगे लिखते हैं, "इसी बीच युद्ध का रुख़ बदलने लगा. तुर्की की हार हुई और बग़दाद पर अंग्रेज़ों का क़ब्ज़ा हो गया. ग़दरी फ़ौज की जीतें यहीं थम गईं. इस ग़दरी फ़ौज का समर्थन ख़त्म हो गया था."
भोगल कहते हैं, "जर्मन गठबंधन हार गया और दूसरी ओर ग़दरियों को भी पकड़ लिया गया."
राणा प्रीत गिल लिखते हैं, "जनवरी 1916 में खानखोजा और उनके कुछ साथी स्थानीय क़बीलाई सरदार बहराम ख़ान बम्पूरी से बातचीत करने के लिए बम्पूरी गए, जिसने पहले उनके उद्देश्य के प्रति निष्ठा जताई थी, लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि पश्चिम में अराजकता फैलाने की उनकी योजना अंग्रेज़ों के सामने खुल चुकी थी."
"ब्रिटेन ने कार्रवाई करते हुए जवाब दिया था और बम्पूरी सहित क्षेत्र के कई क़बीलाई सरदारों को अपने पक्ष में कर लिया था. जब खानखोजा और उनके साथी बम्पूरी से मिलने गए, तो उन पर हमला किया गया, लेकिन वे किसी तरह बच निकलने में सफल रहे."
वे आगे लिखते हैं, "पश्चिम की ओर भागते समय खानखोजा पकड़े गए, जबकि उनके अन्य साथी गिरफ़्तार कर लिए गए. केवल कुछ ही लोग बचकर शिराज़ लौट पाए. इस समय तक ईरान में जर्मन प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा था."

हरीश पुरी कहते हैं, "डॉक्टर खानखोजे अमेरिका से ईरान पहुँचे थे. उन्हें उम्मीद थी कि जर्मन समिति की मदद से वे लोगों को संगठित करेंगे और अफ़ग़ानिस्तान के ज़रिये भारत पर हमला करेंगे. उनकी बहुत उम्मीदें थीं, इन लोगों ने काफ़ी कठिनाइयों का सामना किया था और अच्छे सपने देखे थे, लेकिन वे हक़ीक़त से थोड़ा पीछे रह गए."
भरत डोगरा के अनुसार, "कई स्वतंत्रता सेनानी अपनी सुरक्षा के लिए ईरान जाया करते थे और वहीं से संघर्ष जारी रखते थे. शिराज़ में एक मुठभेड़ के बाद अम्बा प्रसाद ने अपने बाएं हाथ में रिवॉल्वर लेकर हमलावरों का सामना किया. उन्होंने बहुत बहादुरी से लड़ाई लड़ी, लेकिन अंततः पकड़े गए और क़ैद कर लिए गए."
"उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई थी, लेकिन उनकी मृत्यु जेल में ही हो गई. ईरान में उनके जनाज़े में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए. आज भी ईरान में उनके सम्मान में बनाए गए एक स्मारक पर बहुत से लोग जाते हैं."


































