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<title>
ब्लॉग
 - 
Neil Curry
</title>
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<description>यह बीबीसी हिंदी का ब्लॉग है. आप यहाँ विभिन्न विषयों पर बीबीसी संवाददाताओं के ब्लॉग पढ़ सकते है</description>
<language>hi</language>
<copyright>Copyright 2013</copyright>
<lastBuildDate>Thu, 29 Nov 2012 13:46:57 +0530</lastBuildDate>
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	<title>रोटी तोड़ने का अंदाज़</title>
	<description><![CDATA[<p>ऐसी बहुत सारी चीज़ें है जो विदेशियों को स्थानीय लोगों से अलग करती हैं. ये बात मुझे हमेशा कौतूहल में डालती है कि किसी स्थिति में खुद को ढालने या उससे बचे रहने का फ़ैसला लोग कैसे करते हैं. और शायद दुनिया इसी प्रश्न पर विभाजित भी है. </p>

<p>ये सही है कि कुछ विदेशी स्थानीय संस्कृति में ढलने से बचते हैं. मैंने अपनी यात्राओं के दौरान देखा है कि ब्रितानी और अमरीकी लोग तो स्थानीय संस्कृति में समा जाने के उद्देश्य से पहला क़दम तक नहीं उठाते.</p>

<p>और इस बात का सबसे बड़ा संकेत ये है कि ये लोग अंग्रेज़ी बोलने वाले हिस्से में भी ज़ोर-ज़ोर से बोलते हैं.  शायद सिंद्धात ये है कि इससे लोग उन्हें बेहतर ढंग से समझ लेंगे. </p>

<p>और हां एक अन्य ब्रितानी बोझ जो इस ग्रह की बाक़ी प्राणियों पर लादा गया है वो है -अधेड़ मर्दों का दूसरों को सैंडल के साथ लंबे मौज़े पहनने पर मजबूर करना.<br />
 <br />
आह! और फिर वो खान-पान की आदतें. </p>

<p>मेरा मतलब आपने दिल्ली, रोम, मैक्सिको सिटी या सिडनी में कितने अमरीकियों को मैक्डोनाल्ड या केएफ़सी में देखा है? बहुतों को ना? </p>

<p>लेकिन मुझे ये कहना पड़ेगा कि ब्रिटेन आने वाला एक औसत भारतीय पर्यटक भारतीय रेस्तरां ही खोजता है और पब में भी उसे भारतीय व्यंजन ही चाहिए होते हैं. </p>

<p>व्यक्तिगत तौर में जिस जगह जाता हूं वहीं के खाने को अपना लेता हूं. और मुझे ये यात्रा का सबसे अच्छा पहलू लगता है. हां, इस आदत की वजह से आपकी प्लेट में नाइजीरिया में बैल के पैरों का शोरबा हो सकता है!</p>

<p>खुद को दूसरी जगहों के खान-पान में ढालने में सबसे बड़ा सहायक होता है खाना मूंह तक पहुंचाने के स्थानीय तरीके के इस्तेमाल से.</p>

<p>तो जनाब हाल के दिनों में मेरे सर पर रोटी तोड़ने की तकनीक में दक्ष होने का जुनून छाया है. क्योंकि भारत में लगभग हर विदेशी रोटी को दो हाथों से तोड़ता है, जैसे वो किसी कागज़ को फाड़ रहा हो. </p>

<p>मैं तो यही कहूंगा कि मुझे ये तरीका काफी भद्दा लगता है लेकिन हो सकता है कि मैं ग़लत होऊं.</p>

<p>बहरहाल मैं दिल्ली में अपने दफ़्तर के साथियों के खान-पान को देखता रहा हूं. और अब हम इस बारे में सार्वजनिक रूप से बात करते हैं. इसी के आधार पर मुझे लगता है कि रोटी एक हाथ से तोड़ने के कई तरीके हो सकते हैं. </p>

<p><br />
तो बीते शुक्रवार मेरा सामना एक, दो और तीन उंगलियों से रोटी तोड़ने के तरीके से हुआ. और हां एक आधुनिक तरीके से भी जिसमें छोटी उंगली के रोटी में धंसा दिया जाता है. </p>

<p>अब बड़े ही सलीके से रोटी तोड़ने वाले एक सहयोगी का क़िस्सा. इनके बचपन की सबसे बड़ी टेंशन दरअसल रोटी तोड़ने का तरीका ही थी. </p>

<p>इन जनाब को रोटी तोड़ने के लिए दोनों हाथों का इस्तेमाल करना भाता था लेकिन इनके पिताश्री उन्हें एक हाथ से रोटी तोड़ने वाला बनाने के प्रति दृढ़संकल्प थे. </p>

<p>अब मैं कुछ ज्यादा ही जुनूनी दिख रहा होउंग लेकिन मुझे सलीके से, एक दुरुस्त आकार में तोड़ी गई रोटी देखना बहुत अच्छा लगता है. </p>

<p>और मैं अब इसी की खोज में हूं - मैं रोटी को बेहतरीन ढंग से तोड़ने की किसी भी तकनीक या टिप का स्वीकार करने के लिए तैयार बैठा हूं. </p>

<p>तो क्या है आपकी रोटी तोड़ने की बेहतरीन तकनीक?<br />
</p>]]></description>
         <dc:creator>Neil Curry 
Neil Curry
</dc:creator>
	<link>https://meleleh.pages.dev/blogs/hindi/2012/11/post-288.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Thu, 29 Nov 2012 13:46:57 +0530</pubDate>
</item>

<item>
	<title>भारतीय पुरुषों के पाँव</title>
	<description><![CDATA[<p>महान पत्रकारिता को जो चीज़ आम पत्रकारिता से अलग करती है वो उसमे उकेरी छवियाँ या शब्दों के बिंब. ख़बरों में कैद शब्द आपके मन पर जड़ जाते हैं और फिर दिनों, हफ़्तों, सालों तक आपके मन के भीतर संभले रहते हैं.<br />
ऐसा ही कुछ मुझे मिला चंद रोज़ पहले, दिल्ली के लोधी गार्डन में घूमते हुए. लोधी गार्डन शर्तिया दुनिया के सबसे खूबसूरत सार्वजनिक बगीचों में से एक है. <br />
खैर, मूल बात यह है कि उस रोज़ एक चर्चित अंग्रेजी अखबार में एक खेल पत्रकार का  लिखा हुआ कमाल का लेख पढ़ा. ठीक वही शब्दों का जादू जिसका ज़िक्र मैंने किया.<br />
उस लेख में इस बात का ज़िक्र था  कि इन सज्जन ने एक टेनिस का मैच देखा और उन्हें वो ज़रा भी पसंद नहीं आया. <br />
जैसा की होता है, डेविस कप में भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच एक मैच में दो खिलाड़ी भिड़े. <br />
खेल पेचीदा था. <br />
भारत के एक युवा खिलाड़ी ने एक उलटे-सीधे, लड़खड़ाते,  सड़ियल सर्विसों और गड़बड़ बैकहैण्ड से भरपूर प्रदर्शन में पांच सैटों के मैच को जीत लिया. <br />
बकौल लेखक, न्यूज़ीलैंड के खिलाड़ी को देख कर उन्हें ऐसा अहसास हुआ कि वो भला आदमी घर पर घोडे़ बेच सो रहा था कि अचानक अलार्म बजा वो हड़बड़ा कर उठा, भागते हुए हवाई ज़हाज़ में घुसा और बेचारा वहां से निकल ही नहीं पाया. ग़रीब खेला बस खेलने के लिए. <br />
खैर, लेखक की जिस बात ने मुझे  धर दबोचा वो था भारतीय खिलाड़ी के बारे में किया गया उसका वर्णन. लिखने वाले ने कमाल की तस्वीर खींची थी कि किस तरह से भारतीय खिलाड़ी को उस बेचारे दुर्भाग्य के मारे न्यूजीलैंड के खिलाड़ी को हराने संघर्ष करना पड़ा.<br />
पढ़ कर मालूम हुआ कि सारा मसला भारतीय खिलाड़ी के पाँवो में था.<br />
लेखक, ने यहीं बात ख़त्म नहीं की. उसने कहा की  भारतीय टेनिस की सबसे बड़ी समस्या "पाँव" हैं. उसका कहना था कि भारतीय खिलाड़ियों के पास "दुनिया में सबसे उम्दा हाथ हैं लेकिन दुनिया में सबसे घटिया पाँव."  <br />
बस यह बात टंक गयी मेरे मन में और उस रोज़ लोधी गार्डन में घूमते हुए मुझे अचानक वहां टहलते मर्दों के केवल पाँव दिखने लगे. <br />
यह घूमते, सरकते लुड़कते पुड़कते और यदा कदा दौड़ते दक्षिणी दिल्ली के लोग थे. <br />
यकीन जानिये एक भी तराशी हुई मज़बूत दिखने वाली पिंडली पर मेरी निगाह नहीं पड़ी. हाँ, यह ज़रूर हुआ कि पांवो पर किस्म-किस्म की अलग-अलग जगहों पर बंधी हुई पट्टियां ज़रूर दिखीं.<br />
मैं यह मानता हूँ कि दक्षिण दिल्ली में रहने वाले वो लोग जो ज़्यादातर अपने बैठकखाने से लेकर घर के चौके तक ही चक्कर लगते हैं उनके पांवों के देख कर कर मैं आम भारतीय के पाँवो का अंदाज़ नहीं लगा सकता.<br />
लेकिन मैं तय नहीं कर पा रहा हूँ कि माजरा क्या है. <br />
क्या भारतीय पुरुषों के पांवों में दिक्कत है या फिर यह मसला केवल भारतीय टेनिस खिलाडियों तक ही सीमित है.</p>]]></description>
         <dc:creator>Neil Curry 
Neil Curry
</dc:creator>
	<link>https://meleleh.pages.dev/blogs/hindi/2012/11/post-282.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Mon, 19 Nov 2012 07:35:21 +0530</pubDate>
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<item>
	<title>राज कचौड़ी का ज़ायक़ा</title>
	<description><![CDATA[<p>मैं हमेशा खाने के बारे में सोचता हूँ लेकिन इस हफ़्ते मैं इस बारे में कुछ हैरान-परेशान हूँ.</p>

<p>मैं ये समझने का प्रयास कर रहा हूँ कि राज कचौड़ी इतना स्वादिष्ट व्यंजन क्यों है.</p>

<p>क्या ये ठंडे-ठंडे दही और राज कचौड़ी में इस्तेमाल होने वाली करारी चीज़ों का मिश्रण है?</p>

<p>क्या ये इस व्यंजन में पाए जाने वाले आलू के विभिन्न स्वरूप और अंकुरित दाल के मेल से पैदा होने वाला जादू है?</p>

<p>क्या ये इसमें कभी-कभी पाए जाने वाले अनार के दानों और रहस्यमई हरी चटनी का खेल है?</p>

<p>मुझे नहीं पता...और असल में मुझे परवाह भी नहीं...जब तक कि राज कचौड़ी स्वादिष्ट हो...</p>

<p>मुझे नहीं परवाह कि मुझे राज कचौड़ी कहाँ मिलती है और किस तरह की प्लेट में परोसी जाती है.</p>

<p>मुझे इस बात की परवाह भी नहीं कि मैं किस तरह की हिलती-डुलती कुर्सी पर बैठे इसे खाता हूँ या फिर मेरी पसंद के ख़िलाफ़ एक विशालकाय फ़र्राटेदार पंखा मेरे चेहरे और सिर को ही उड़ा देने वाली हवा मुझ पर फेंक रहा हो.</p>

<p>राज कचौड़ी खाते समय मुझे वाहनों के हॉर्न और भौंकते हुए कुत्तों की आवाज़ों का भी कोई एहसास नहीं रहता है.</p>

<p>ये सही है कि जैसे ही आप राज कचौड़ी को खाने लगते हैं तो ये दलदल में ग़ोते लगाने के समान लगता है लेकिन इससे इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है.</p>

<p>और फिर...भगवान आपका भला करे...लस्सी को कौन भूल सकता है?</p>

<p>मुझे नहीं पता कि आपकी इस बारे में क्या सोच है लेकिन मेरे विचार में बेहतरीन लस्सी के गिलास के ज़रिए आप निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं.</p>

<p>यदि मिट्टी का कुल्हड़ और बड़ा हो तो मैं तो उसमें नहाने के लिए भी तैयार हूँ. <br />
मैंने इस बारे में किसी से चर्चा तो नहीं की है लेकिन मुझे लगता है कि असली लस्सी में ठंडे-ठंडे कुल्हड़ में ऊपरी आधा इंच गाढ़ा दही होना चाहिए. <br />
असली लस्सी में तो इतना गाढ़ा होता है कि इसे चम्मच से ही खाया जा सकता है.</p>

<p>बाक़ी की लस्सी तो पी जा सकती है लेकिन ख़ाली कुल्लड़ में चम्मच डाल कर जो कुछ ही उसके भीतर बचा रह गया हो उसे खुरचने से रहा नहीं जा सकता है.</p>

<p>और हाँ...फिर कुल्हड़ का भी सवाल है...ऐसा क्यों कि कोई भी इसे दोबारा इस्तेमाल ही नहीं करना चाहता? मैं एक दिन काफ़ी सारे ख़ाली कुल्हड़ अपने नज़दीक के ढाबे में ले गया. </p>

<p>लेकिन ढाबे के मालिक ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने उसे ये कह दिया हो कि उसकी माता जी की रातों-रात दाढ़ी उग आई है.</p>

<p>जब उसने अपने ढाबे के वेटरों से बात की तो वे अचानक ही काम में ख़ासे व्यस्त नज़र आने लगे या फिर ऐसे दिखे जैसे वे बाथरूम जाने का बहाना बना रहे हों. </p>

<p>ऐसा लगा कि वे कुछ भी करने को तैयार हैं लेकिन लस्सी के दीवाने इस विदेशी व्यक्ति से जूझना नहीं चाहते जो मिट्टी के छोटे-छोटे कुल्हड़ उनके हाथ में थमाने पर आमादा है.</p>

<p>कुछ शर्मिंदगी ज़रूर महसूस हुई लेकिन मुझे लगता है शायद ये ज़रूरी था. पता नहीं मेरे ऐसा करने से कोई सोचने पर मजबूर हुआ या नहीं...</p>

<p>अब बात करें सिज़लर की...ये दुनिया के किस भाग से आया? </p>

<p>भोजन के इस मक्का के इतने सारे रेस्तरां बेहतरीन तरीक़े से बने खाने को धुँए की धुँध में परोसने का पागलपन क्यों करते हैं? </p>

<p>यही नहीं इसे परोसते समय वेटर का वो हाल होता है जैसे उसका दम घुटा जा रहा हो. गुस्ताख़ी माफ़...लेकिन मुझे व्यंजन परोसने का ये तरीक़ा समझ में नहीं आया. </p>

<p>हाँ, मैं खाना गरम परोसने की बात समझ सकता हूँ लेकिन क्या ये ज़रूरी है कि पूरे रेस्तरां को अम्लवर्षा के बादल और गंध सहनी पड़े जबकि केवल प्लेट को ही गरम करने से काम चल सकता हो. </p>

<p>किसी रेस्तरां में बैठे हुए जब भी मैं सिज़लर परोसा जाता देखता हूँ तो मुझे उस रेस्तरां का एक दृश्य याद आ जाता है जहाँ मैं अक्सर जाता हूँ.</p>

<p>रेस्तरां और उसकी किचन के बीच एक घूमने वाला दरवाज़ा है और जब भी वो भयभीत करने वाला क्षण आता है जब किचन से ज्वालामुखी की तरह से निकलने वाली बने हुए खाने के धुँए की लपटें उठती दिखती हैं तो मुझे वो बेचारा वेटर याद आता है जो घूमने वाले दरवाज़े में बनी खिड़की के पीछे खड़ा हुआ नज़र आता है.</p>

<p>उसके खड़े रहने का कारण उस आदेश का पालन करना होता है कि धुँए को कुछ कम होने दिया जाए और फिर ही वे रेस्तरां में अपना सिज़लर लेकर दाख़िल हों...और दाख़िल ऐसे हों जैसे सलामी बल्लेबाज़ छक्का लगाने के बाद मैदान पर नज़र आता है.. </p>

<p>उस खिड़की से मैं आम तौर पर शांत और विचलित न होने वाले वेटर को देखता हूँ जो सांस लेने के लिए जूझ रहा होता है और सेकेंड गिन रहा होता है जब वो उस 'नरक' से रिहा होगा.</p>

<p>वाह भोजन आह भोजन! आप उसे पसंद करें या उससे घृणा करें - हर क्षण वो आपको बहला सकता है, लेकिन मुझे अब भी समझ नहीं आ रहा कि राज कचौड़ी इतनी ख़ास क्यों है?</p>]]></description>
         <dc:creator>Neil Curry 
Neil Curry
</dc:creator>
	<link>https://meleleh.pages.dev/blogs/hindi/2012/10/post-275.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Mon, 08 Oct 2012 23:17:30 +0530</pubDate>
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<item>
	<title>वेबसाइट का नया रुप</title>
	<description><![CDATA[<p>किसी भी मौजूदा वेबसाइट, रेडियो- टीवी प्रोग्राम या अख़बार में परिवर्तन दिलचस्प भी होता है और द्वंद्व भरा भी.</p>

<p>एक ओर तो आप चाहते हैं कि श्रोता, दर्शक या पाठक का ध्यान इस ओर आकर्षित भी हो और दूसरी ओर आप चाहते हैं कि वह इसे अनदेखा भी कर जाए. यानी आप नहीं चाहते कि श्रोता, दर्शक और पाठक जिस तरह चीज़ों को देखने के आदि हैं, उसमें कोई खलल पहुँचे लेकिन दूसरी ओर आप चीज़ों को बेहतर भी बनाना चाहते हैं जिससे कि नए लोग इसके प्रति आकर्षित हों.</p>

<p>पिछले दो महीनों से हम <a href="https://meleleh.pages.dev/hindi/">bbchindi.com </a>में थोड़े-थोड़े परिवर्तन करते रहे हैं और उम्मीद करते रहे हैं कि ये परिवर्तन लोगों को पसंद आएँगे.</p>

<p>लेकिन सवाल ये है कि क्या आप क्या सोचते हैं? क्या हम अपने प्रयासों में सफल हुए हैं? या मैं आपसे पूछूँ कि आपने इन परिवर्तनों को महसूस किया या नहीं? मुझे लगता है कि आपने इसे महसूस किया है.</p>

<p>इस बीच हमने न केवल सामग्रियों की संपादकीय गुणवत्ता में सुधार किया है बल्कि हमने बीबीसी हिंदी वेबसाइट को नए रूपाकार में पेश करने की भी कोशिश की है. हमें उम्मीद रही है कि इन परिवर्तनों से सुधार आएगा और ये पाठकों को पसंद भी आएगा.</p>

<p>अब जो ताज़ा परिवर्तन बीबीसी हिंदी वेबसाइट पर किए गए हैं उसका उद्देश्य यूज़र-एक्सपीरिएंस को बेहतर बनाना है. इसके लिए एक ओर हमने इंडेक्स में थोड़ी काट-छाँट की है और दूसरी ओर होमपेज पर सामग्रियों को बेहतर ढंग से उभारने की कोशिश की गई है.</p>

<p>इसलिए अब आपकी राय हमारे लिए मूल्यवान होगी. आप क्या सोचते हैं, ये परिवर्तन आपके लिए अच्छे हैं, बुरे हैं, हास्यास्पद हैं, गंभीर हैं, घिसेपिटे से हैं या दार्शनिक क़िस्म के हैं?</p>

<p>इन परिवर्तनों से पहले हमने व्यापक रिसर्च किया है कि लोग इंटरनेट पर बीबीसी हिंदी से क्या चाहते हैं. ये जानना अच्छा लगा कि लोग हमसे वही चाहते हैं जो हमारी ताक़त है, भारत को वैश्विक परिप्रेक्ष में प्रस्तुत करना और दुनिया को भारत के परिप्रेक्ष्य में पेश करना. इसे 'ग्लोबल इंडिया' या 'वैश्विक भारत' कहना ठीक लगता है.</p>

<p>इसका मतलब ये है कि जब हमारी नज़र दुनिया पर होती है तो नक्शे के बीचो-बीच भारत होता है और हम जब दुनिया के किसी भी हिस्से से जुड़े विषय पर काम करते हैं तो हम ये विचार करते हैं कि इससे भारतवासियों का क्या संबंध हो सकता है. दूसरे शब्दों में कहें तो हम 'हबल टेलिस्कोप' जैसे किसी उपकरण के साथ दुनिया के ऊपर विचरण कर रहे होते हैं लेकिन हमारी नज़र भारत पर और विश्व मंच पर भारत के महत्व पर केंद्रित होती है.</p>

<p>इस दृष्टिकोण को ज़हन में रखते हुए हमने भारत के पन्ने को बदलकर उसे संपूर्ण बनाने की कोशिश की है और एक पन्ना अंतरराष्ट्रीय ख़बरों का है, जिसमें दुनिया भर की ख़बरें पाठकों की दिलचस्पी के हिसाब से विभिन्न खंडों में प्रकाशित की जाएँगीं. इसके अलावा होमपेज पर छह अलग-अलग विषयों पर सामग्री उपलब्ध होगी. इसमें एक खंड चर्चित चेहरे का होगा क्योंकि हमारा रिसर्च बताता है कि आप चर्चित व्यक्तियों के बारे में ज़्यादा पढ़ना चाहते हैं. इसके अलावा रिसर्च बताता है कि आप को तस्वीरें पसंद आती हैं, इसलिए हमने होमपेज के दाहिने हिस्से में सबसे ऊपर फ़ोटो गैलरी बनाए रखने का फ़ैसला किया है.</p>

<p>ये थे इस परिवर्तन के पीछे हमारे विचार.</p>

<p>अब आपसे अनुरोध है कि इस नए रुपाकार वाली वेबसाइट पर एक संपूर्ण दृष्टि डालिए और हमें बताइए कि आप इसके बारे में क्या सोचते हैं. हमें आपके विचार जानकर प्रसन्नता होगी.</p>]]></description>
         <dc:creator>Neil Curry 
Neil Curry
</dc:creator>
	<link>https://meleleh.pages.dev/blogs/hindi/2012/09/post-271.html</link>
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	<category></category>
	<pubDate>Thu, 27 Sep 2012 12:00:10 +0530</pubDate>
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<item>
	<title>नो हॉर्न प्लीज़!</title>
	<description><![CDATA[<p>जब मैं किसी भारतीय सड़क पर होता हूं, एक लम्हा ज़रुर आता है जब किसी के ज़ोरदार और हिंसक तरीके से हॉर्न बजाने से झल्ला जाता हूं. </p>

<p>मुझे लगने लगता है कि अभी यहां कोई बड़ा दंगा-फ़साद होने वाला है या किसी का शरीर क्षत-विक्षत हो गया है या कम से कम हॉर्न बजाने वाले को सड़क पर कोई दस मीटर गहरा गड्डा दिख गया है. लेकिन ये तो किसी भी आकस्मिक लम्हे की आकस्मिक यात्रा के दौरान कोई भी ड्राइवर (जो हमेशा पुरूष होता है) हो सकता है. </p>

<p>तो जब भी हॉर्न बजता है तो मैं ड्राइवर के चेहरे को देखने के लिए मजबूर हो जाता हूं और जब मुझे उस चेहरे भाव बेपरवाह सा लगता तो मैं सोचता हूं, "जैसे ही कोई भारतीय मर्द ड्राइविंग सीट पर बैठता है तो उसे क्या हो जाता है?"</p>

<p>ठीक है कि ऐसी घटनाएं दक्षिण लंदन के मेरे इलाके में भी होती हैं. लेकिन वो इतनी अधिक तो कतई नहीं होती जितनी आधुनिक शहरी भारत में. </p>

<p>क्या इसकी वजह ये है कि भारत में कारें अब भी सिर्फ़ पांच प्रतिशत लोगों के पास ही हैं और इनके मालिक ख़ुद को ख़ास, ताक़तवर और सड़कों का बादशाह समझते हैं? </p>

<p>दिल्ली की सड़कों पर गाड़ी चलाने वाले एक आम ड्राइवर के बारे में सोचिए. मसलन वो कितनी बार पीछे घूमकर सावधानी से गाड़ी को सड़क पर मोड़ते हैं? आपको नहीं कि ये लोग सिर्फ़ सामने देखते हैं और हॉर्न बजाते हुए ये उम्मीद करते हैं कि उनके पीछे वाले उनसे दूर रहेंगे और आगे वाले उनके लिए डर के मारे रास्ता छोड़ देंगे. </p>

<p>मुझे एक बार मुंबई में एक टैक्सी वाले ने बताया, "रियर-व्यू मिरर का कोई मतलब नहीं है क्योंकि सभी हॉर्न बजाते रहते हैं इसलिए आपको हमेशा पता होता है कि कौन कहां है."</p>

<p>साधारण और एक एकदम वास्तविक राय. तो इसका रिश्ता ताक़त या घमंड से नहीं है. इसका मकसद है - आगे निकलना.</p>

<p>इस बीच मैं लाल प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठकर राज कचौरी का आनंद ले रहा हूं. दक्षिण दिल्ली के छोटे से बाज़ार में मैं कुत्तों के एक झुंड को काफ़ी दिलचस्प और मंनोरंजक पाता हूं. </p>

<p>तभी अचानक ज़ोरदार हॉर्न बजता है. </p>

<p>संजीदा बात तो ये है कि इतनी ज़ोरदार आवाज़ आप तभी सुन सकते हैं जब आपके बोनेट में 'बर्लिनर फ़िलहार्मोनिक ओर्केस्ट्रा' हो. हॉर्न इतना भयानक था कि कुत्तों के भी कान खड़े हो गए. और फिर एक लग्ज़री कार सामने दिखी. शायद बीएमडब्ल्यू या ऑडी. यहाँ सैंट्रों जैसी छोटी गाड़ी मुश्किल से अंदर घुस पा रही थी लेकिन ताकत और उच्च वर्ग की ये निशानी इस रफ़्तार से अंदर आ रही थी कि जैसे वो यूसैन बोल्ट को शर्मिंदा करना चाहती हो. </p>

<p>फिर मैंने उस कार में बैठे आदमी की शक्ल देखी. वो अपने स्मार्टफ़ोन पर गप्पे लड़ाने में व्यस्त था और उसका दूसरा हाथ चमड़े के कवर वाले स्टेयरिंग व्हील पर था. </p>

<p>उसके हाव-भाव साफ़ थे - तुम में से कोई भी मुझे छू नहीं सकता, अगर तुम्हारी तकदीर अच्छी हुई तो तुम मेरे जूते ज़रुर चाट सकते हो. </p>

<p>लेकिन ये सब हो क्या रहा है? आप इतने-सारे लोगों को अपने चेहरे पर ऐसे भाव के साथ क्यों देखते हैं जैसे कि वो कह रहे हों कि 'मैं अपने आस-पास के लोगों से अधिक महत्वपूर्ण हूं.'</p>

<p>गुड़गांव के एक्सप्रेस-वे पर ट्रक हों, दिल्ली की सड़कों पर बसें या टैक्सियां, सभी दबादब हॉर्न बजाते हैं. इस धातु बक्से के भीतर बैठते ही लोगों को कुछ हो जाता है. जैसेकि ये बक्सा यानी उसका वाहन कह रहा हो, "मैंने तुम्हें चुना है, तुम ख़ास हो, तुम्हें बिल्कुल सीधे उस पैदल यात्री की ओर गाड़ी चलाने का हक़ है क्योंकि अगर उसे बचना है तो हट ही जाएगा."</p>

<p>इस समाज में जाति और वर्ग बहुत महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन शायद आम सोच रखने वाले लोग ऐसा कभी ना करें. </p>

<p>ओह...कोई मध्यम दर्जे का सियासतदान बहुत-सी छोटी सुज़ुकी जीपों के काफ़िले के साथ  गुज़र रहा है और साथ है कुछ एबेंसेडर गाडियाँ - अपने रहस्यमयी लंबे एंटिना के साथ. </p>

<p>कुत्ते भी अब खिसक रहे हैं. हम भी खा-पीकर निकलते हैं.</p>]]></description>
         <dc:creator>Neil Curry 
Neil Curry
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	<link>https://meleleh.pages.dev/blogs/hindi/2012/09/post-269.html</link>
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	<pubDate>Wed, 19 Sep 2012 12:09:58 +0530</pubDate>
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