पार्कों में क़तार में खड़े पत्थर के हाथियों की सूँड या पूँछ 'मनुवादी गुंडे' तोड़ सकते हैं और उनकी रक्षा के लिए 'बहनजी' अपनी पुलिस पर भरोसा भी नहीं कर सकतीं.
जब दो हज़ार करोड़ की लागत से स्मारक बनाए गए हैं तो उनकी हिफ़ाज़त पर महज 53 करोड़ रुपए ख़र्च करने में क्या बुराई है? 'दलितों के आत्मसम्मान' के मायावती के तर्क और 'अरबों के आत्मसम्मान' के सद्दाम के नारे में फ़र्क़ दिखना बंद हो गया है.
ज़्यादातर मामलों में सद्दाम और मायावती की तुलना नहीं हो सकती लेकिन जीते-जी अपनी मूर्तियाँ बनवाने का शौक़ दोनों में एक जैसा दिखता है.
अपनी मूर्तियाँ लगवाने की गहरी ललक के पीछे कहीं एक गहरा अविश्वास है कि इतिहास के गर्त में जाने के बाद शायद लोग याद न रखें. मगर शख़्सियतों का आकलन इतिहास अपने निर्मम तरीक़े से करता है और उसमें मूर्तियाँ नहीं गिनी जातीं.
सोवियत संघ के विघटन के बाद क्रेमलिन में धड़ से टूटकर गिरा हुआ लेनिन की मूर्ति का सिर हो या फ़िरदौस चौक पर जंज़ीरों से खींचकर गिराई गई सद्दाम की मूर्ति, ये इतना तो ज़रूर बताती हैं कि उनके ज़रिए बहुत लंबे समय तक लोगों के दिलों पर राज नहीं किया जा सकता.
कहने का ये मतलब नहीं है कि मायावती की मूर्तियों के साथ भी ऐसा ही होगा या ऐसा ही होना चाहिए, मगर वे शायद ये नहीं समझ पा रही हैं कि ज्यादातर मूर्तियों की वर्ष के 364 दिन एक ही उपयोगिता होती है-- कबूतरों और कौव्वों का 'सुलभ शौचालय', 365वें दिन धुलाई के बाद माल्यार्पण.
स्मारकों की रक्षा के लिए बनाए जा रहे विशेष सुरक्षा बल में चिड़ियों को भगाने वालों को भर्ती किया जा रहा हो तो बात अलग है.
वैसे सुना है कि उन्हें किसी ने चाँद पर ज़मीन का टुकड़ा भेंट किया है, वहाँ मूर्तियाँ लगवाने के बारे में उन्हें सोचना चाहिए क्योंकि वहाँ कौव्वे और कबूतर नहीं हैं.
'हिंदी दिवस' और 'बालिका दिवस' में क्या समानता है?
यही कि दोनों कमज़ोर हैं, समाज की नज़रों में बेचारी हैं और इन पर तरस खाने और इनका ख़्याल रखने की ज़रूरत है.
भारत की राष्ट्रभाषा कमज़ोर है. भारत में देवी की पूजा करने वाले अपनी लड़कियों को निराश्रित और निस्सहाय बनने से नहीं रोक पा रहे हैं.
यह देश का दुर्भाग्य है या उसके कर्णधारों का,यह एक अलग बहस का मुद्दा है. आइए आज बात करें राष्ट्रीय बालिका दिवस की.
क्या इस तरह के दिवस या इस अवसर पर होने वाले आयोजनों से लड़कियों का कुछ भला होता दिख रहा है?
बड़े पैमाने पर गोष्ठियाँ, लड़कियों की दुर्दशा पर भाषण, उनकी स्थिति सुधारने को लेकर लंबे-चौड़े वायदे...कितने लोग याद रख पाते हैं?
एक क़िस्सा सुना था कि नेताजी की बीवी तैयार हो रही थीं और अपने घर काम करने वाली ग्यारह वर्षीया बच्ची को झिड़क रही थीं, "अरी कलमुँही, साड़ी पर जल्दी से इस्त्री कर...बालिका दिवस पर भाषण देने जाना है".
बालिका दिवस का औचित्य तभी है जब अपने आसपास कूड़ा बटोरती, चौराहों पर भीख मांगती, घरों में झाड़ू-पोंछा करती बालिकाओं की सुध लेने की ज़िम्मेदारी हम आप जैसे नागरिक उठाएँ.
और दूर क्यों जाएँ...क्या हमने पूरी तरह अपने घरों में बेटे-बेटी में फ़र्क़ करना छोड़ दिया है?
भारत का हरेक नागरिक एक-एक बच्ची की क़िस्मत संवारने की ज़िम्मेदारी भी लेले तो भविष्य में साल का एक दिन बालिका दिवस के रूप में मनाने की ज़रूरत महसूस नहीं की जाएगी.
और यह दिन मनाया भी जाएगा तो बालिका गौरव दिवस के रूप में...क्या आप इस काम में भागीदार बनेंगे?
मैं मुंबई में पिछले छह साल से रह रहा हूँ और मुझे ऐसा महसूस होता है यह शहर मेरा अपना शहर है. यहाँ की कई चीज़ें मुझे काफ़ी अच्छी लगती हैं, जिनमें से एक यहाँ की काली-पीली टैक्सियाँ भी हैं. यह टैक्सियाँ मुंबई की ख़ास पहचान में से एक है. मैं इन टैक्सी चालकों को भी बहुत पसंद करता हूँ.
मैं उनकी ईमानदारी का लोहा मानता हूँ. मुझे याद है एक बार मैंने एक टैक्सी वाले का इंटरव्यू किया था. वो ग़रीबी में दिन गुज़ार रहा था, लेकिन उसने अपनी गाड़ी में जब एक बड़ा बैग पड़ा हुआ पाया तो उसे खोला तक नहीं और सीधे उसे जमा करने के लिए ठाणे के पुलिस थाने चला गया.
ठाणे में तब तक बैग का मालिक पहुँच गया था. वो काला बैग हीरों से भरा हुआ था. बैग का मालिक शहर का एक अमीर जौहरी था. जौहरी ने टैक्सी वाले को 25 हज़ार रूपए इनाम देने की कोशिश की, लेकिन उसने लेने से यह कह कर इनकार कर दिया कि यह उसका फ़र्ज था. हाँ उसने पुलिस के ज़रिए दी गई वो चिट्ठी ले ली जिसमें उसकी ईमानदारी की प्रशंसा की गई थी.
वो टैक्सी वाला उत्तर प्रदेश के जौनपुर का रहने वाला था. मुंबई के अधिकतर टैक्सी चालक उत्तर भारतीय हैं. लेकिन अब उन राज्यों के लोग जो मुंबई में टैक्सी चलाने की ख़्वाहिश रखते हैं, उन्हें राज्य सरकार परमिट नहीं जारी करेगी. कारण साफ़ है मराठी भाषा की जानकारी और पिछले 15 सालों से राज्य के निवासी होने की शर्त.
इसके बाद मैं इस सोच में हूँ कि मुंबई में मैं एक टैक्सी चालक भी नहीं बन सकता.
लेकिन सवाल यह उठता है कि इन नियमों की ज़रूरत पड़ी ही क्यों?
यहाँ आम धारणा है कि यह एक राजनीतिक चाल है. ज़रा इस ख़बर पर ग़ौर कीजिए. 18 जनवरी को महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने यह एलान किया कि वो महाराष्ट्र में रहने वाले सभी परिवारों को चिठ्ठी भेजेंगे, जिसमें वो उनसे आम जीवन में मराठी भाषा का प्रयोग करने की अपील करेंगे. इस चिट्ठी को उनके कार्यकर्ता घर-घर जाकर पहुंचाएंगे. यह काम मराठी भाषा दिवस यानी 27 फ़रवरी को किया जाएगा .
यह सभी समझते हैं कि सरकार ने राज ठाकरे के इस एलान के दो दिनों बाद परमिट वाले नए नियमों का एलान क्यों किया.
यह एक ऐसा हथियार है जिससे कांग्रेस पार्टी राज ठाकरे और शिव सेना के क़िलों में सेंध लगा सकती है. एक मंत्री ने पार्टी को यही सलाह दी कि राज ठाकरे को मात देने के लिए उसकी ही चाल चली जाए.
अब तक राज ठाकरे मराठी भाषा के पक्ष में और हिंदी के ख़िलाफ़ जिहाद करते आए हैं अब कांग्रेस भी मैदान में कूद गई है
लेकिन कभी-कभी ज़्यादा चालाकी भी अच्छी नहीं होती. जैसा कि इस मामले में हुआ. अब मुख्यमंत्री सफ़ाई दे रहे हैं कि परमिट के लिए स्थानीय भाषा का जानना ज़रूरी है और मराठी की तरह हिंदी और गुजराती भी मुंबई की स्थानीय भाषा है.
मुझे चिंता सिर्फ़ उन दर्जनों मराठी दोस्तों की है और उन लाखों मराठियों की है जो भेदभाव के ख़िलाफ़ हैं और इस तरह की ख़बरों के बाद उन्हें मायूसी होती है. वो अपने राज्य से प्यार ज़रूर करते हैं, लेकिन पहले अपने देश से प्रेम करते हैं.
जब से एक नाईजिरियाई अपने अंडरवियर में बारूद छिपा कर एक अमरीकी विमान पर सवार होते पकड़ा गया है उस के बाद से अमरीकियों ने हर एयरपोर्ट पर फुल बॉडी सर्च के लिए स्कैनिंग मशीन लगाने का फ़ैसला लिया है.
यह ख़बर सुन कर मुझे एक वाक़्या याद आ रहा है कि 1943 में जब दूसरा विश्व युद्ध अपने चरम पर था तो अंग्रेज़ों ने हिंदुस्तान में तुरंत सैनिकों की भरती का कार्यक्रम शुरु कर दिया. कई शहरों की तरह लाहौर में भी किराए के एक टांगे पर लगे लाउड स्पीकर पर घोषणा शुरु हो गई कि सेना में भरती के केंद्र पर 18 साल से ऊपर के युवक इंटरव्यू के लिए आएं.
कामयाब उम्मीदवारों को अच्छा वेतन, मेडिकल सुविधा, मुफ़्त राशन, मुफ़्त वर्दी और विदेश यात्रा का अवसर मिलेगा और रिटायरमेंट के बाद पेंशन भी.
उस ज़माने में युद्ध की वजह से बेरोज़गारी बहुत ज़्यादा थी इसलिए युवक बड़ी संख्या में फ़ौजी भरती केंद्र पर जाने लगे.
एक फौजी डॉक्टर भरती केंद्र पर उम्मीदवारों की प्रारंभिक मेडिकल जांच कर रहा था. जब डॉक्टर ने एक युवक से कहा कपड़े उतारो तो युवक ग़ुस्से में आकर कहने लगा. तुसी लोग बाहर वर्दी, मुफ़्त राशन ते तनख़्वाह दी गल करदे हो ते अंदर कपड़े उतारदे हो.
मुझे फ़ुल बॉडी सर्च पर कोई आपत्ति नहीं क्योंकि मेरे पास भी वही कुछ है जो भगवान ने किसी भी यात्री को दिया है.
अमरीकी आप्रवासन अधिकारी ने यह भी आश्वासन दिया है कि फ़ुल बॉडी सर्च का रिकॉर्ड स्कैनिंग के तुरंत बाद डिलीट कर दिया जाएगा.
फिर भी मुझे डर है कि उन्होंने स्कैनिंग रिकॉर्ड डिलीट न किया तो मैं क्या करूँगा. अगर मैं अट्ठारह बीस साल का युवक होता तो मुझे इस की भी परवाह न होती कि अमरीकी मेरी बॉडी स्कैनिंग का रिकॉर्ड डिलीट करें या घर ले जाएँ.
मैं ख़ुशी ख़ुशी अहमद फराज़ की यह पंक्तियाँ गुनगुनाता हुआ फुल बॉडी सर्च की मशीन से गुज़र जाता कि
सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है
मकीं उधर के भी जलवे इधर के देखते हैं
लेकिन 48 साल की उम्र में यह जोखिम नहीं उठाया जा सकता. बल्कि मैं तो यह सोच कर कांप जाता हूँ कि किसी दिन अगर कोई चरमपंथी अंडरवियर के बजाए कहीं और बारूद छिपा कर विमान पर चढ़ गया तो फिर अमरीकी अधिकारी लाखों यात्रियों के साथ क्या क्या नहीं करेंगे?
मेरा यह डर सुन कर सर्जिकल दस्ताने बनाने वाले एक दोस्त ने कहा, तेरे मुँह में घी शक्कर...
बीबीसी के एक सर्वेक्षण के मुताबिक जबकि दुनिया भर के लोग सबसे बड़ी समस्या ग़रीबी को मानते हैं, भारत और पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी आफ़त आतंकवाद है.
ग़रीबी और आतंकवाद में यह समानता है कि उसका धर्म या मज़हब से कोई लेना देना नहीं है. ग़रीबी जब पैर पसारती है तो उसकी ज़द में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी आते हैं.
आतंकवादी की गोली भी इस मामले में कोई भेदभाव नहीं करती. बच्चे, बुज़ुर्ग, औरतें किसी को भी इससे निजात नहीं.
सर्वेक्षण के नतीजों से साफ़ जाहिर है कि भारत-पाकिस्तान की जनता ग़रीबी से लड़ने की हिम्मत तो रखती है लेकिन आतंकवाद ने उसका हौसला पस्त कर दिया है.
हालाँकि हाल में इस तरह के हमलों ने लोगों को एकजुट किया. उनमें घबराहट देखी गई लेकिन उन्होंने जम कर हालात का मुक़ाबला किया.
लेकिन यह भी सच है कि जनता को अब न सरकारी वायदों पर भरोसा है न सेना और पुलिस की बढ़ती मौजूदगी पर.
घर का कोई सदस्य रात गए घर न पहुँचे और उससे संपर्क न हो पा रहा हो तो परिवार के अन्य सदस्यों की साँसें अटक जाती हैं.
ग़रीबी अचानक हमला नहीं बोलती. आतंकवाद बिना कहे, चुपचाप सामने आता है.
ग़रीबी से मुक़ाबला करने की तैयारी की जा सकती है. बाज़ार या मेले में होने वाले चरमपंथी हमले से बचने के लिए कोई सिर पर हेल्मेट लगा कर या शरीर पर बख़्तरबंद धारण करके घर से नहीं निकल सकता.
ग़रीबी या भूख से मौत के क़िस्से भी सुने हैं.
लेकिन आतंकवादी हमले के शिकार जीते जी अपाहिज बने भी देखे जा सकते हैं.
और यह स्थिति मौत से भी बदतर है!
कवि पाश ने कहा था, 'सबसे ख़तरनाक होता है सपनों का मर जाना...'
एक बच्चा उड़ीसा के जंगलों में मिला था. 11-12 साल का. उसने बताया कि उसका पिता किसान है. और उत्सुकतावश पूछा कि किसान यानी? तो उसने मासूमियत से कहा, ग़रीब आदमी. वह बच्चा नक्सलियों के साथ रहता और घूमता फिरता है. एके-47 से लेकर पिस्टल तक सब कुछ चलाता है. वह बड़ा होकर नक्सली बनना चाहता है. उसका कहना है कि अपने लोगों का भला ऐसे ही हो सकता है.
एक बच्चा बलिया में मिला. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के गुज़र जाने के बाद, उनके बंगले की रखवाली करता हुआ. वह दस साल का रहा होगा. पान मसाला खाते हुए वह बताता है कि एक दिन वह अपने बड़े भाई के दुश्मनों को चाकू मारना चाहता है और कट्टा हासिल करके वह अपने नेताजी के लिए काम करना चाहता है. इस काम में उसे रुतबा दिखाई देता है.
एक बच्ची मुज़फ़्फ़रपुर के रेडलाइट एरिया में मिली. उम्र बमुश्किल आठ साल. यह जानने के बाद कि मैं दिल्ली में रहता हूँ, उसने उत्सुकता के साथ कहा कि एक दिन वह मुंबई जाना चाहती है. करना वही चाहती है, जो उसकी माँ मुज़फ़्फ़रपुर में करती है. वह कहती है कि इस काम में उसे कोई बुराई नहीं दिखती, लेकिन यह शहर ख़राब है.
एक बच्चा दिल्ली के बड़े स्कूल में पढ़ता है. आठवीं कक्षा में. डिस्कवरी चैनल पर 'फ़्यूचर वेपन' यानी भविष्य के हथियार कार्यक्रम को चाव से देखता है. वह एक दिन सबसे ज़्यादा तेज़ी से गोली चलाने वाले बंदूक का आविष्कार करना चाहता है. उसका तर्क है कि गोलियों से आख़िर बुरे लोग ही तो मारे जाते हैं.
पाश की कविता अक्सर लोगों को रोमांचित करती है. लेकिन इन बच्चों के सपने सुनकर तो रूह काँप जाती है.
क्या इन सपनों को भी ज़िन्दा रखा जाए?
वैसे तो मुझे भारत और पाकिस्तान के संबंधों में कई बातें समझ में नहीं आती, लेकिन यह बात बिल्कुल समझ में नहीं आती कि अचानक बैठे बिठाए बात प्यार, मुहब्बत और शांति से शुरु होते होते गाली-गलौज में कैसे बदल जाती है.
भारत- हम पाकिस्तान में लोकतंत्र की स्थिरता चाहते हैं. एक मज़बूत पाकिस्तान भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया के हित में है.
पाकिस्तान- हम भारत के साथ समग्र बातचीत का स्वागत करते हैं. दोनों देशों का नेतृत्व धीरे-धीरे सभी समस्याएं शांति प्रक्रिया के ज़रिए हल करने की क्षमता रखता है.
भारत- हम चाहते हैं कि दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़े और वीज़ा नियमों में नरमी हो.
पाकिस्तान- यदि नियंत्रण रेखा की दोनों ओर से व्यापार और लोगों की अवाजाही में आसानी हो तो धीरे-धीरे सीमाएँ बे-मानी होती जली चाएँगी.
भारत- दोनों देशों के बीच शांति प्रक्रिया अब पीछे नहीं जा सकती, लेकिन पाकिस्तान को सबसे पहले अपने यहाँ आतंकवाद के ख़िलाफ ठोस क़दम उठाने होंगे.
पाकिस्तान- दक्षिण एशिया को भारत और पाकिस्तान शांति का केंद्र बना सकते हैं, लेकिन भारत को बलोचिस्तान में हस्तक्षेप बंद करना होगा.
भारत- जब तक पाकिस्तान आतंकवाद का अड्डा बना रहेगा, बातचीत का कोई फ़ायदा नहीं.
पाकिस्तान- भारत को आरोप-प्रत्यारोप से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए और इलाक़े में दादा बनने का शौक़ अपने मन से निकाल देना चाहिए.
भारत- अगर चीन और पाकिस्तान से एक ही समय पर युद्ध होता है तो भारत दोनों का एक साथ मुक़ाबला करने की क्षमता रखता है.
पाकिस्तान- जनरल दीपक कपूर को अच्छी तरह पता है कि पाकिस्तान क्या कर सकता है और भारतीय सेना कितने पानी में है.
भारत- अब तक सीमा पार से आतंकवाद हो रहा है. अमेरिका और अन्य शक्तियाँ पाकिस्तान को समझाएँ कि वह आग से न खेले.
पाकिस्तान- जिस प्रकार से हम ने पाकिस्तान हासिल किया है उसी प्रकार से कशमीर भी हासिल करेंगे. चाहे हज़ार साल तक युद्ध क्यों न करना पड़े.
भारत- क्या पाकिस्तान भूल गया कि सन् 71 में क्या हुआ था. क्या उसे दोबारा याद दिलाना पड़ेगा.
पाकिस्तान- हमारी ओर जो भी मैली आँख से देखेगा वह आँख निकाल दी जाएगी.
भारत- पाकिस्तान अपने क़द से बड़ी बात करने से पहले अपने घर की आग तो बुझाले.
पाकिस्तान- अबे तेरी तो....
भारत- अबे तेरी ऐसी की तैसी.....
(यदि भारत और पाकिस्तान किसी अच्छे मनोचिकित्सक से संपर्क करने पर तैयार हो जाएँ तो इलाज के पैसे मैं अपनी जेब से देने को तैयार हूँ.)
क्या आपके बच्चे 10 से 15 साल की आयु के हैं? क्या वे अक्सर उदास रहते हैं? क्या वे गुस्से में अपनी जान लेने की धमकी देते हैं? क्या वे इस कम उम्र में ग़म के गाने ज़्यादा सुनते हैं? अगर हाँ, तो आपको उनकी तरफ ज़्यादा ध्यान देना पड़ेगा.
भारत में नाबालिग बच्चों द्वारा आत्महत्या करने के मामलों की तादाद बढ़ती जा रही है. हाल में आई एक रिपोर्ट के अनुसार अमरीका की तरह भारत में भी 10 से 15 साल के लड़के और लड़कियों द्वारा आत्महत्या के मामलों में 2004 से 75 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई है.
इसका उदाहरण हमें मुंबई में नए वर्ष के पहले सप्ताह में देखने को मिला. नए वर्ष के पहले कुछ दिनों में दो आत्महत्याओं की ख़बर ने मुंबई शहर के लोगों को झकझोर कर रख दिया है.
आत्महत्याओं की ख़बरें यूँ भी हमें उदास कर देती हैं लेकिन नाबालिग बच्चों द्वारा की गई आत्महत्याओं की ख़बरें हमें बड़ा झटका देती हैं.
नया साल शुरू होने के दुसरे दिन यह खबर आई कि 11वर्षीय नेहा सावंत ने अपने ही दुपट्टे से लटककर आत्महत्या कर ली. नेहा ने टीवी प्रोग्राम बूगी-वूगी में एक साल पहले भाग लिया था.
ख़बरों के अनुसार वो डांस के अन्य प्रोग्रामों में भाग लेना चाहती थी लेकिन घरवालों ने मना कर दिया और पढ़ाई पर ध्यान देने को कहा था. उसके माता-पिता इस बात से इनकार करते हैं कि उनकी 11वर्षीय बेटी पर किसी तरह का दबाव था.
इस ख़बर के झटके से शहर संभल भी नहीं सका था कि 12 वर्ष के सुशंत पाटिल द्वारा दादर में अपने स्कूल में ही आत्महत्या की ख़बर ने सनसनी फैला दी. वो छह में से चार विषयों में फ़ेल हो गया था. सवाल यह है कि इन दो नाबालिग बच्चों को अपनी जान लेने पर किस चीज़ ने मजबूर किया..?
आमतौर पर इस उम्र के बच्चों में जीने की उमंग होती है और वो मौत से घबराते हैं. यह दो आत्महत्याएं मुंबई में चर्चा का विषय हैं.
कोई कहता है सिस्टम की ग़लती है तो कोई माँ बाप को ज़िम्मेदार मानता है और कुछ लोगों के अनुसार आजकल के बच्चे छोटी-छोटी नाकामयाबियों के कारण उदास हो जाते हैं और डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं.
एक दो नाबलिग बच्चों की माँ ने मुझसे कहा कि उसके हिसाब से मुंबई में जगह की कमी है जिसके कारण बच्चे स्कूल के बाद खेलने घर से बाहर नहीं जा पाते और घरों में रहकर बोर हो जाते हैं. एक अन्य माँ ने कहा कि परिवार वाले इसके ज़िम्मेदार हैं क्योंकि वे बच्चों पर 90 प्रतिशत अंक हासिल करने के लिए भरपूर दबाव डालते हैं.
कारण जो भी हो, इन दो नाबालिग बच्चों द्वारा आत्महत्या हमारे लिए खतरे की घंटी की तरह है. मेरी भी एक कम उम्र की बेटी है. अब मैं ख़ुद से यह सवाल करने लगा हूँ कि कहीं बच्चों की परवरिश में हम से या समाज से चूक तो नहीं हो रही है.
अभी-अभी मेरी एक सहयोगी ने एक लिफ़ाफ़ा थंमाया जो मेरे नाम था और हमारी एक पार्टनर साइट से आया था.
लिफ़ाफ़े में बंद ग्रीटिंग कार्ड देख कर एक सुखद आश्चर्य हुआ. आप यक़ीन कीजिए नववर्ष की शुभकामनाओं वाला यह पहला और एकमात्र कार्ड है जो डाक से आया है.
ऐसा नहीं है कि शुभकामनाएँ नहीं मिलीं. बहुत मिलीं और ढेरों मिलीं. लेकिन फ़ोन पर, एसएमएस से, ईमेल से, ईकार्ड से या फिर फ़ेसबुक पर संदेश के रूप में.
किसको फ़ुर्सत है कि कार्ड ख़रीदे, डाकटिकट का इंतज़ाम करे और फिर लेटर बॉक्स में उसे डालने जाए.
लेकिन सच मानिए. यह कार्ड देख कर लगा कि यदि किसी ने इतनी मेहनत की है तो वह सच मायने में धन्यवाद का पात्र है.
ईमेल पर तो ऐसे भी संदेश मिले जो थोक के भाव दसियों लोगों को बढ़ाए गए थे. यानी संदेश भेजने वाला सिर्फ़ आप के बारे में ही नहीं सोच रहा था.
डाक से आया पत्र या कार्ड आपको ही संबोधित होगा या ज़्यादा से ज़्यादा आपके परिवार के सदस्यों को.
और अगर आपको इस तरह की डाक रद्दी की टोकरी में फेंकने की आदत नहीं है तो यह कार्ड बरसों-बरस आपके पास सुरक्षित रहेगा और आगे चल कर जब आप पुरानी तस्वीरों की तरह अपनी यादों की पोटली खंगालेंगे तो आपको याद आएगा कि फ़लां वर्ष में आपके एक मित्र ने आपको यह कार्ड भेजा था.
आज इलेक्ट्रॉनिक युग में ईमेल एक सुविधाजनक साधन है. आप पहली जनवरी की सुबह किसी को शुभकामनाएँ भेजें तो वह पलक झपकते ही आपके मित्र तक पहुँच जाएँगी.
लेकिन डाक से कार्ड भेजने के लिए आपको कम से कम पाँच दिन पहले उस मित्र को याद करना होगा.
पर, अगर दोस्ती है तो यह तो हक़ बनता है, भाई...